Monday, July 20, 2009

बालिका वधू पर सवाल


उमेश चतुर्वेदी
14 जुलाई को लोकसभा में सवाल भर्तृहरि महताब का था...जवाब अंबिका सोनी ने दिया ...लेकिन उनका जवाब पूरा होने का जैसे जनता दल यू के अध्यक्ष शरद यादव कर रहे थे। उन्होंने छूटते ही बालिका वधू पर शारदा एक्ट के उल्लंघन और इसके जरिए बाल विवाह को बढ़ावा देने का आरोप जड़ दिया। शरद यादव कोई मामूली नेता नहीं हैं, लिहाजा अंबिका सोनी को कहना पड़ा कि वे इस पर विचार करेंगी। यानी बालिका वधू पर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने निगरानी या तो शुरू कर दी है या फिर वह जल्द ही करने वाला है। जाहिर है, यदि मंत्रालय को ऐसा लगा तो टेलीविजन की सबसे मासूम और नन्हीं बहू को देखने के आदी रहा एक बड़ा दर्शक वर्ग इससे वंचित हो सकता है।
इसका नतीजा चाहे जो हो, लेकिन ये सच है कि बालिका वधू पर संसद में उठी निगाहों की प्रासंगिकता और जरूरत पर भी सवाल उठने लगे हैं। टेलीविजन की अतिरेकी भूमिका को लेकर शरद यादव की चिंताएं और उनके रूख से हर वह शख्स परिचित है, जो उनके थोड़ा-बहुत भी करीब रहा है। पूर्व गृह राज्य मंत्री गावित के खिलाफ चले स्टिंग ऑपरेशन को लेकर वे एक चैनल के खिलाफ वे कितने नाराज थे, इसे उन लोगों ने देखा है, जो राज्य सभा की कार्यवाही को कवर करते रहे हैं। लेकिन बालिका वधू पर उनका सवाल उठाना और उस पर ये आरोप लगाना कि यह बाल विवाह को बढ़ावा दे रहा है, समझ से परे लग रहा है। ये सच है कि टीआरपी के दबाव में खबरिया चैनलों ने जिस तरह खबरों से खिलवाड़ किया, उससे राजनेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग टेलीविजन से खार खाए बैठा है। मीडिया जगत में भी इस परिपाटी पर सवाल उठे...इस गलती को दबी जबान से ही सही, मीडिया के अंदरूनी हलके में भी स्वीकार किया जाने लगा है। लेकिन बालिका वधू पर सवाल और उसे लेकर सूचना और प्रसारण मंत्री के जवाब को लोग पचा नहीं पा रहे हैं।
ये सच है कि एक दौर में टेलीविजन का प्राइम टाइम सास-बहू के अंतहीन झगड़ों और उच्च वर्ग के परिवारों के बीच जारी षडयंत्र के किस्सों से गुंजायमान था। ऐसे माहौल में एक वर्ग को मनोरंजन चैनलों से भी ऊब होने लगी थी। ऐसे माहौल में जब पिछले साल बालिका वधू ने दस्तक दी तो दर्शकों ने इसे हाथोंहाथ लिया। एकरस कार्यक्रमों की भीड़ में बालिका वधू हवा के नए झोंके की तरह सामने आया। और देखते ही देखते इस सीरियल की नन्हीं बहू आनंदी यानी अविका गौर घर-घर की महिलाओं की चहेती बन गई। एक दौर तो ऐसा भी आया कि मनोरंजन चैनलों के प्राइम टाइम पर इसी धारावाहिक की तूती बोलने लगी और इसके साथ ही नए नवेले चैनल कलर्स ने अपना झंडा गाड़ दिया। फिर तो ना आना इस देश लाडो, अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजौ जैसे धारावाहिक आए और प्राइम टाइम में छा गए। सास-बहू की एकरस कहानियों से भरी प्राइम टाइम की दुनिया में इन धारावाहिकों की सफलता की वजह रहे इनके नए – नए और तकरीबन टेलीविजन की दुनिया से अछूते रहे विषय। प्राइम टाइम की दुनिया में भले ही इन धारावाहिकों की तूती बोल रही है, लेकिन राजनेताओं की निगाहें इन पर टेढ़ी होती जा रही हैं।
ये भी सच है कि बालिका वधू की कहानी में वह कसावट नहीं रही , जो शुरूआती कई हफ्तों में दिखती रही थी। टीआरपी के दबाव और कमाई के चलते इस धारावाहिक की कहानी में भी कई असहज और अप्रासंगिक मोड़ आने लगे हैं, जिनका कोई तर्क नहीं नजर आता। कुछ यही हालत अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजौ और ना आना इस देश लाडो की कहानी के साथ भी हो रहा है। लेकिन इसका ये भी मायने नहीं है कि ये धारावाहिक बाल विवाह, कन्या भ्रूण हत्या और बिहार में लड़की बेचने की कुप्रथाओं को बढ़ावा दे रहे हैं। सही बात तो ये धारावाहिक जिन चैनलों पर दिखाए जा रहे हैं, उन्हें सामान्य एंटीना के जरिए नहीं देखा जा सकता। इन्हें देखने के लिए केबल या डीटीएच की जरूरत होगी। और इस देश में विकास के तमाम दावों के बावजूद बड़े शहरों को छोड़ दें तो केबल या डीटीएच का खर्च वहन करने की क्षमता निम्न मध्यवर्ग और कम पढ़े-लिखे परिवारों के पास नहीं है। जाहिर है, उन घरों तक इन धारावाहिकों की पहुंच ही नहीं है। ऐसे में शरद यादव या भर्तृहरि महताब के इस आरोप को कैसे सही माना जा सकता है कि ये धारावाहिक शारदा एक्ट या फिर बाल विवाह कानून का उल्लंघन कर रहे हैं।
अगर कुरीतियों को दिखाना भी उसे बढ़ावा देना है तो भ्रष्टाचार को उजागर करना भी उसे महिमा मंडित करना हो जाएगा। और अगर एक बार हमने इसे मान लिया तो ये भी सच है कि भ्रष्टाचार का खुलासे पर भी संसद से लेकर सड़क पर सवाल उठने लगेंगे। जाहिर है ये मौका खुद मीडिया की अतिरेकी भूमिकाओं ने मुहैया कराया है। ऐसे में सबसे बड़ी जरूरत ये है कि राजनीति की ओर से हो रहे ऐसे सवालों का तार्किक जवाब दिया जाय। मीडिया और कला की मॉनिटरिंग होनी चाहिए। इसे खुले मन से मीडिया को भी स्वीकार करना चाहिए। लेकिन इसका ये भी मतलब नहीं है कि हर गैरजरूरी सवालों का भी सामना किया जाय। कम से कम मनोरंजन चैनलों के बदलाव भरे सीरियलों पर उठे सवाल तो ऐसी ही श्रेणी में आते हैं।

Monday, June 8, 2009

ये सीरियल कुछ खास है!


उमेश चतुर्वेदी
हिंदी टेलीविजन की दुनिया में इन दिनों दो समानांतर धाराएं आगे बढ़ती नजर आ रही हैं। एक तरफ खबरिया चैनलों की दुनिया है, जहां पारंपरिक खबरों की सिमटती दुनिया का फिलहाल कोई तार्किक अंत होता नजर नहीं आ रहा है, जबकि दूसरी तरफ है मनोरंजन चैनलों की बदलती दुनिया। सास-बहू के अंतहीन झगड़े और महानगरों के बड़े और रईसजादे परिवारों के भीतर जारी साजिशों की दुनिया अब बदलती नजर आ रही है। कभी महिलाओं जीवन की करूणागाथा के प्रतीक रहे गीत अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजौ की पैरोडी अब सकारात्मक तौर पर बदल चुकी है। अब अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजौ से लेकर ना आना लाडो इस देश के बहाने अब महानगरीय जिंदगी की वे शामें बदलने लगीं हैं, जो टेलीविजन के पर्दे के सहारे आगे बढ़ती रही हैं।
हिंदी फिल्मी दुनिया के बारे में माना जाता है कि वहां जो मसाला एक बार हिट हो जाता है, उसकी तेजी से नकल शुरू हो जाती है। एक फिल्मी फार्मूले के दोहन की होड़ लग जाती है। सेटेलाइट चैनलों की बढ़ती भीड़ के शुरूआती दौर यानी करीब आठ साल पहले बॉलीवुड के इसी रोग ने हिंदी टेलीविजन चैनलों को भी घेर लिया था। सास-बहू के अंतहीन झगड़ों, प्यार-मोहब्बत की नाटकीय किस्सागोई और परिवार के भीतर रची जा रही साजिशों का इतना जोर बढ़ा कि बुद्धू बक्से की वह दुनिया ही पूरी तरह बदल गई, जिसकी बुनियाद हमलोग, बुनियाद, मैला आंचल, गणदेवता और शांति जैसे सीरियलों के जरिए रखी गई थी। निश्चित तौर पर ये दूरदर्शन का दौर था। दूरदर्शन के विस्तार के शुरूआती सालों में वही किस्सा दोहराया गया, जो कभी आजादी के ठीक बाद रेडियो के लिए तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री केसकर और आकाशवाणी के महानिदेशक जगदीश चंद्र माथुर ने मिलकर लिखा था। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि जिस दौर में यानी नब्बे के दशक में जब हिंदी टेलीविजन की सेटेलाइट दुनिया बदलने लगी थी, उसी दौर में उदारीकरण की शुरूआत हुई। और सास-बहू के साजिशों के किस्से रंगीन सेटेलाइट चैनलों के सहारे भारतीय मध्यवर्ग के ड्राइंग रूमों की शोभा बढ़ाने लगे। यह भी सच है कि जी टीवी ना सिर्फ हिंदी, बल्कि देश का पहला निजी सेटेलाइट चैनल रहा। अपने शुरूआती दिनों में उस पर वैसा बाजारवाद हावी नहीं रहा, जो आज से छह महीने पहले तक हर सेटेलाइट चैनल की पहचान बना हुआ था। हम पांच जैसे कुछ अर्थवान धारावाहिक उसकी जान रहे। उसे पहली बार टक्कर 1998 के आसपास मिलना शुरू हुआ, जब सोनी का टीवी चैलन लांच हुआ। इसके साथ ही शुरू हुए प्रतिस्पर्धा के दौर को तेजी मिली करीब आठ साल पहले, जब पीटर मुखर्जी की अगुआई में स्टार ग्रुप ने भारत में अपने पांव रखे। इसके साथ ही महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक के ड्राइंग रूम की तस्वीर बदलने लगी। निश्चित रूप से इसमें एकता कपूर के बनाए सीरियल क्योंकि सास भी कभी बहू थी या कहानी घर-घर की जैसे सीरियलों ने नई परिपाटी शुरू की। चूंकि तब तक बाजारवाद अपने चरम पर पहुंच चुका था, तब मुनाफा कमाना हर प्रोफेशन की पहली शर्त बन गया था। ऐसे में दूरदर्शनी जमाने शुरू हुई परंपरा को आघात लगना ही था। यही वह दौर है, जब शहरी मध्यवर्ग तेजी से उभर रहा था। इसका असर ये हुआ कि सास-बहू मार्का ये धारावाहिक और उनके साजिश रचने वाले पात्र ना सिर्फ लोकप्रिय हुए, बल्कि उनकी पहचान भी बनी। फिर तो ऐसे धारावाहिकों की जैसे बाढ़ ही आ गई। कसौटी जिंदगी की, कस्तूरी, कुमकुम एक प्यारा सा बंधन..जैसे तमाम सीरियल टेलीविजन के नए और तेजी से बढ़ रहे उपभोक्ताओं को तेजी से लुभाने लगे। टेलीविजन पर मनोरंजन का पूरा का पूरा संसार इसी फार्मूले पर चल पड़ा। जिसमें लोकप्रिय पात्र मरने के बाद जिंदा होते रहे। याद कीजिए क्योंकि सास भी कभी बहू थी के प्रमुख पात्र मिहिर को, इसे निभा रहे अमर उपाध्याय की मौत हुई, लेकिन कहानी की मांग के नाम पर उन्हें जिंदा किया गया। कसौटी जिंदगी की में भी ऐसा ही हुआ। स्टार प्लस अपने इन सीरियलों के जरिए आठ साल तक टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट में नंबर वन की कुर्सी पर बैठा रहा। जाहिर है इसमें सगुन, कहीं किसी रोज, विदाई, संजीवनी जैसे कई धारावाहिकों का योगदान रहा। पीटर मुखर्जी के स्टार ग्रुप से अलग होने के बाद ऐसी आशंका जताई जा रही थी कि उनके प्रोमोशन में शुरू हुए चैनल नाइन एक्स भी वैसा ही धमाका करेगा। लेकिन नहीं हुआ। अलबत्ता स्टार के दबाव में जी टीवी को भी सात फेरे, बेटियां जैसे सीरियल लाने पड़े। वहां भी वैसी ही साजिशें और अंदरूनी उठापटक जारी रही।
यही वह दौर रहा, जब हिंदी के खबरिया चैनलों पर पारंपरिक खबरों की बजाय सांप-बिच्छू नचाने, काल-कपाल और महाकाल दिखाने का दौर शुरू हुआ। ये कथानक और खबरें एक दौर तक तो अपने नयापन के चलते दर्शकों को लुभाती रहीं। लेकिन बाद में आलोचकों, समाजवैज्ञानिकों और प्रबुद्ध वर्ग द्वारा इसकी आलोचना होने लगी। लेकिन इस आलोचना से टेलीविजन चैनल अप्रभावित रहे। टीआरपी का दबाव और बहाना ऐसे सीरियलों को एलास्टिक की तरह बढ़ाते रहने का बहाना बना रहा। लेकिन पिछले साल आए टीवी 18 ग्रुप के नए चैनल कलर्स ने इन धारावाहिकों की दुनिया ही बदल दी। बाल विवाह के दंश पर आधारित सीरियल बालिका बधू आज टेलीविजन की रेटिंग प्वाइंट में नंबर वन बना हुआ है। इसकी वजह ये नहीं है कि इसमें पारंपरिक मसाले और लटके-झटके हैं। बल्कि इसमें बचपन में शादी के चलते परिवार, समाज और उस बच्चे की जिंदगी पर कैसा और क्या असर पड़ता है, इसे कथा में पिरोया गया है। कहना ना होगा, ऐसे अर्थवान धारावाहिक के जरिए हिंदी के मनोरंजन चैनलों की दुनिया फिर एक बार उसी ढर्रे पर लौटरने लगी है, जिसकी शुरूआत रमेश सिप्पी जैसे निर्माता और मनोहर श्याम जोशी जैसे लेखक के साथ दूरदर्शन ने नब्बे के दशक के शुरूआती दिनों में बुनियाद और हमलोग जैसे धारावाहिकों के जरिए की थी। कलर्स पर इन दिनों जितने भी सीरियल आ रहे हैं, उनमें कथ्य को लेकर ताजगी तो है ही, व्यापक सामाजिक सरोकारों से भी जुड़े हैं। कलर्स का ही एक और सीरियल है, ना आना इस देश मेरी लाडो। इसमें बालिका भ्रूण हत्या के मामले को कथा के फ्रेम में बेहतर तरीके से पिरोकर पेश किया गया है। जो देखने वाले का दिल छू लेता है। इसी तरह जीवन साथी में भी एक ऐसे परिवार की कहानी पेश की गई है, जहां परिवार का मुखिया अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए अपने परिवार और अपनी बेटी तक को दांव पर लगाने से नहीं चूकता। इसी तरह एक और अर्थवान सीरियल उतरन भी दिखाया जा रहा है, जिसमें एक बड़ा रईस परिवार अपनी एक गलती के चलते उसकी शिकार गरीब महिला और उसकी बेटी को ठाटबाट से पाल रहा है।
कलर्स के इन अर्थवान धारावाहिकों ने इस बाजार के अगुआ रहे स्टार प्लस, सोनी और जीटीवी को भी अर्थवान धारावाहिकों की दौड़ में शामिल होने के लिए मजबूर कर दिया। अब जीटीवी भी अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजौ जैसा धारावाहिक दिखाना पड़ रहा है। इसी तरह एक और धारावाहिक आपकि अंतरा जैसा धारावाहिक भी शुरू करना पड़ा है। वैसे जब क अक्षर वाले धारावाहिकों का दौर जारी था, उसी दौर में जस्सी जैसी कोई नहीं जैसा सीरियल सोनी पर दिखाया जाता रहा। उसका सीआईडी अभी तक चल ही रहा है। लेकिन नए दौर के चलन में उसे भी लेडीज स्पेशल लेकर आना पड़ा है। जिसमें चार महिलाओं की जिंदगी और आम जिंदगी में उनकी जद्दोजहद को पेश किया जा रहा है।
कलर्स के जरिए शुरू हुई धारावाहिकों की विविधरंगी दुनिया में दो चीजें खासतौर से नोट की जा सकती हैं। एक ये कि अधिकांश धारावाहिक महिला समस्याओं से दोचार होने के कथ्य से भरे पड़े हैं। दूसरा, अब तक बिहार और बिहारी लोग टेलीविजन धारावाहिकों में सिर्फ बदहाली और नौकर वाली भूमिकाओं के पर्याय रहे हैं। लेकिन अब वहां की भी वह जिंदगी लोगों के सामने आ रही है, जिसमें जिंदगी की परेशानियां भी हैं तो खूबसूरत रंग भी। उम्मीद की जानी चाहिए कि मनोरंजन चैनलों की दुनिया में आ रहे इस सकारात्मक बदलाव से खबरिया चैनल भी जल्द ही सबक लेंगे और खबरों की दुनिया भी उसी तरह बदलाव से भरी नजर आ सकेगी।

Tuesday, May 26, 2009

अखबारों के खिलाफ उठी आवाज


उमेश चतुर्वेदी
लोकसभा चुनावों के दौरान उम्मीदवारों से पैसे लेकर खबरें छापने और अखबारी पैकेज न लेने वाले उम्मीदवारों की चुनाव प्रचार तक की खबरों को जगह ना देने का विरोध वरिष्ठ पत्रकार तो कर रहे हैं, लेकिन चिंता की बात ये है कि खुद पत्रकारिता में इसे लेकर कोई अपराधबोध नजर नहीं आ रहा है। हिंदी के शीर्ष पत्रकार प्रभाष जोशी तो इस परिपाटी के खिलाफ मशाल लेकर निकल पड़े हैं। उन्होंने इसके खिलाफ अभियान छेड़ दिया है। प्रभाष जी मशाल लेकर निकलें और उसे भले ही अखबारों का साथ नहीं मिले, लेकिन जिस तरह से पत्रकारों का साथ मिलना शुरू हुआ है, उससे साफ है कि ये बात दूर तलक जाएगी।
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल के नोएडा परिसर की गोष्ठी लोकसभा चुनावों में मीडिया की भूमिका में प्रभाष जोशी ने कहा कि अखबारों और पाठकों के बीच विश्वास का रिश्ता होता है। अखबार में छपी चीजों पर पाठक भरोसा करता है। लेकिन उम्मीदवारों से पैसे लेकर खबरें छाप कर अखबार पाठकों के इसी भरोसे को तोड़ रहे हैं। प्रभाष जी जैसे वरिष्ठ पत्रकार ही ऐसा कह सकते हैं। क्योंकि ये भी सच है कि पत्रकारिता की दुनिया में इसे लेकर खास उहापोह नजर नहीं आ रहा है। इसका उदाहरण खुद उन्हें अपने ही शहर इंदौर में नजर आया। मई के दूसरे हफ्ते में वे इंदौर के अखबारों में शुरू हुई इस परिपाटी को लेकर तैयार रिपोर्ट को जारी किया तो उसकी एक कॉलम तक की खबर नहीं छपी। प्रभाष जी को इस बात का अफसोस है कि ये रिपोर्ट बी जी वर्गीज जैसे पत्रकारिता के शलाका पुरूष के हाथों हुआ, और इंदौर के अखबारों ने उनकी वरिष्ठता और पत्रकारिता में उनके योगदान तक का भी ध्यान नहीं रखा।
यह सिर्फ प्रभाष जी की ही पीड़ा नहीं है। पत्रकार और बीजेपी के राज्यसभा सांसद चंदन मित्रा ने तो इससे भी आगे की बात बताई। उनके मुताबिक चैनलों ने भी लोकसभा चुनावों के दौरान जमकर चांदी काटी है। उन्होंने खबरिया चैनलों का नाम तो नहीं लिया, लेकिन ये जरूर बताया कि खबरों के लिए आपस में मारकाट मचाने वाले कई चैनलों में राजनीतिक दलों से प्रचार का पैकेज हासिल करने के लिए जबर्दस्त एकता नजर आई। उन्होंने शर्त रखी थी कि ना सिर्फ उन्हें, बल्कि उनके बुके के दूसरे चैनलों को भी पैकेज देना होगा। दिलचस्प बात ये है कि पहले तो राजनीतिक दलों ने इसे नकार दिया, लेकिन बाद में उन्हें इसे मानना पड़ा। उनके अनुमान के मुताबिक अकेले चैनलों ने इस दौरान करीब 100 करोड़ का बिजनेस किया।
गोष्ठी में शामिल अधिकांश वरिष्ठ पत्रकारों का मानना था कि पैसे लेकर खबरें छापने का चलन अब शुरू हुआ है। लेकिन इसका प्रतिकार वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय और श्याम खोसला ने किया। रामबहादुर जी के मुताबिक 14 साल पहले महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में भी राजनीतिक दलों ने जमकर पैसे लिए थे। जबकि श्याम खोसला के मुताबिक पंजाब के विधानसभा चुनावों में भी ऐसा काफी पहले शुरू हो गया था। बहरहाल सबका यही मानना था कि इस परिपाटी से ना तो पाठकों को सही सूचनाएं पाने का अधिकार सुरक्षित रहेगा, ना ही यह लोकतंत्र के लिए बेहतर होगा। लेकिन आर्थिक पत्रकार आलोक पुराणिक का मानना कि जब मीडिया कंपनियां पूंजी बाजार और शेयर मार्केट से पूंजी जुटाएंगी तो उनका सबसे बड़ा उद्देश्य लाभ कमाना रह जाएगा। सही मायने में यही हो भी रहा है। लिहाजा उन पर भी अपने शेयरधारकों को फायदा पहुंचाने का दबाव बढ़ गया है और इस दबाव में उनके लिए ईमानदार पत्रकारिता से ज्यादा जरूरी पैसे कमाना रह गया है। इस गोष्ठी में राजनीति की ओर से सोमपाल शास्त्री ने अपनी पीड़ाएं जाहिर कीं। बागपत से पिछला लोकसभा चुनाव लड़ चुके सोमपाल शास्त्री ने कहा कि जिस तरह अखबारों ने उनसे खबरों के बदले पैकेज की मांग की, उससे उनका मन इतना खट्टा हुआ कि एक बारगी उन्होंने अखबारों के खिलाफ ही आवाज बुलंद करने की तैयारी कर ली थी।
बहरहाल इस परिपाटी का विरोध कैसे हो। इसका जवाब वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र प्रभु ने सुझाया कि अखबारी संस्थानों में ट्रेड यूनियनों को जब तक बढावा नहीं दिया जाएगा, पत्रकारों की नौकरियों की गारंटी नहीं होगी, तब तक वे इसके खिलाफ नहीं उठ खड़े होंगे। प्रभाष जी ने भी इसे स्वीकार तो किया, लेकिन उनका मानना था कि सिर्फ इतने से ही बात नहीं बनेगी। प्रभाष जी इस परिपाटी के खिलाफ जनजागरण पर तो निकल ही पड़े हैं। उनकी योजना चुनाव आयोग से ये मांग करने की है कि वह चुनाव प्रक्रिया के दौरान अखबारों में छपे विज्ञापनों का खर्च भी उनके चुनाव खर्च में जोड़े। इसके साथ ही वे वरिष्ठ पत्रकारों के साथ सुप्रीम कोर्ट में भी इसके खिलाफ याचिका दायर करने की तैयारी में हैं। इसके साथ ही उनका कहना है कि वकालत और डॉक्टरी जैसे प्रोफेशन की तरह पत्रकारों को शपथ पत्र पर हस्ताक्षर करना जरूरी किया जाना चाहिए। और गड़बड़ी करने पर उन्हें पत्रकार यूनियन निष्कासित भी करे। प्रभाष जी को इस बात का भी मलाल है कि इस गलत परिपाटी के खिलाफ एक भी पाठक खुलकर सामने नहीं आया। उन्होंने कहा कि अब पाठकों को जगाना होगा ताकि वे आदर्श पत्रकारिता के पक्ष में उठ कर खड़े हो सकें। उन्होंने कहा कि मीडिया की साख बचाने के लिए यह जरूरी है कि पैसे लेकर छापी जाने वाली खबरों को विज्ञापन का रूप दिया जाए। इसकी सूचना पाठकों को स्पष्ट रूप से देनी आवश्यक होनी चाहिए।
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति अच्युतानंद मिश्र पाठकों को जागरूक करने और उनके क्लब बनाने की वकालत करते रहे हैं। इस गोष्ठी में भी उन्होंने इस बात को आगे बढ़ाने पर जोर दिया। विश्वविद्यालय के नोएडा परिसर के निदेशक अशोक टंडन ने कहा कि इस अभियान का सिलसिला यहीं नहीं थमेगा।

Sunday, May 10, 2009

पत्रिका चर्चा

नए अनुभवों से गुजरने की यात्रा
उमेश चतुर्वेदी
टेलीविजन चैनलों के विस्तार के इस दौर में साहित्यिक और सांस्कृतिक मंचों पर एक रोना सामान्य हो गया है। हर वक्ता को गंभीर पाठकों का अभाव हर समारोह में सालता रहता है। ऐसे स्यापे भरे माहौल में अगर 2009 ने नई उम्मीदें जगाईं हैं। साल के पहले ही महीने में दस साल के लंबे अंतराल के बाद पूर्वाग्रह जैसी गंभीर पत्रिका ने पाठकों की दुनिया के बीच दोबारा प्रवेश किया। मध्य प्रदेश की राजधानी भारत भवन की ये पत्रिका पहले अशोक वाजपेयी के संपादन में निकलती थी। भोपाल जैसी जगह से प्रकाशित होती रही इस पत्रिका ने सांस्कृतिक और साहित्यिक जगत में गंभीर और वैचारिक रचनाओं के जरिए इस पत्रिका ने समय और संस्कृति में खूब हस्तक्षेप किया। लेकिन जब भारत भवन महज सांस्कृतिक केंद्र ना रहकर सियासी अखाड़े में तब्दील होता गया – इस पत्रिका पर संकट के बादल मंडराने लगे और दस साल पहले इसका प्रकाशन स्थगित कर दिया गया। लेकिन पिछले साल जब भारत भवन के न्यासी मंडल का पुनर्गठन हुआ और उसमें प्रभाकर श्रोत्रिय शामिल किए गए – तब से एक बार फिर उम्मीद जताई जाने लगी थी कि भारत भवन की खोई प्रतिष्ठा वापस लौटेगी और वह एक बार फिर कम से कम साहित्यिक केंद्र के तौर पर सकारात्मक कदम उठाने में संभव होगा। पूर्वग्रह का प्रकाशन कम से कम इस उम्मीद पर खरा तो उतरता ही है। प्रभाकर श्रोत्रिय के संपादन में निकले इसके 124 वें अंक में ढेरों ऐसी रचनाएं हैं – जिनसे गुजरना पाठकों को नई सूचनाएं, नए विचार और नई उम्मीद दे सकता है। इस अंक में ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता कवि कुंवर नारायण पर खास सामग्री दी गई है। इनमें उनकी चुनिंदा रचनाओं का विश्लेषण, कुछ बेहतरीन रचनाएं और उनका साक्षात्कार शामिल है। इस अंक में स्वर्गीय प्रभा खेतान का एक लेख स्त्री और मीडिया भी प्रकाशित किया गया है। स्त्री की नई छवियां रचते मीडिया का इतना बेहतरीन विश्लेषण प्रभा ही कर सकती थीं।
2009 जहां नई उम्मीदें लेकर आया है – वहीं पिछले साल ने भी कुछ सकारात्मक नींव भी रखी। पिछले साल कुछ पत्रिकाओं के लिए नियमित होने के लिए भी याद किया जाएगा। कथन इसी साल से लगातार नियमित अंतराल पर प्रकाशित हो रही है। निश्चित तौर पर इसके लिए नई संपादक संज्ञा उपाध्याय की रचना दृष्टि, सोच और मेहनत का खासा योगदान है। इसी दौरान जनगाथा का भी नियमित तौर पर प्रकाशन शुरू हुआ है। बिहार के आरा में रह रहे कथाकार और बैंककर्मी अनंत कुमार सिंह और उनके दोस्तों की रचनात्मक जिद्द के चलते ये पत्रिका भी पाठकों के लिए नियमित अंतराल पर उपलब्ध रहने लगी है। पत्रिका के जनवरी अंक में यूं तो ढेरों रचनाएं हैं। लेकिन पत्रकार कुमार नरेंद्र सिंह का लेख आतंकवाद की सांप्रदायिक समझ. सुभाष शर्मा का नारीवादी लेखिका डोरिस लेसिंग पर लेख – कोई भी चीज स्थायी नहीं इस अंक में पठनीय बन पड़े हैं।
कोलकाता की भारतीय भाषा परिषद की पत्रिका वागर्थ की संपादकीय अगुआई कवि और आलोचक विजय बहादुर सिंह ने संभाल ली है। उनके संपादन में आया वागर्थ नई रचनात्मक उम्मीद जगा रहा है। वागर्थ के जनवरी अंक का संपादकीय खासतौर पर निराला को समर्पित है। इस संपादकीय में निराला को नए ढंग से समझने की कोशिश की गई है। पारंपरिक वाम सोच से आगे भी निराला की रचनात्मकता सक्रिय थी, इस संपादकीय के जरिए समझा जा सकता है। इस अंक में आलोक श्रीवास्तव की कविताएं पहला वसंत, तुम मेरा ही स्वप्न अपनी भावप्रवणता के लिए ध्यान आकर्षित करती हैं। केशव तिवारी की कविता रातों में अक्सर रोती थी मर चिरैया पीछे छूटे गांव को पूरी मार्मिकता से याद कराकर सराबोर कर देती है।
संपादक बदलने की चर्चा हो रही है तो इसी कड़ी में अगला नाम आता है कृति ओर का। कृति ओर अब कवि विजेंद्र की जगह रमाकांत शर्मा के संपादन में निकलने लगी है। हालांकि उनका नाम अब भी प्रधान संपादक की जगह साया हो रहा है। वागर्थ की तरह इसका संपादकीय भी विचारोत्तेजक बन पड़ा है। इस संपादकीय में लोक से निकलती कविता और उसके लोकभाष्य पर गंभीर विवेचन किया गया है। इस संपादकीय में कवि को प्रकृति के साथ चलने की जमकर वकालत की गई है। संपादकीय के मुताबिक कविता के लिए जीवन द्रव्य जितना जरूरी है – उतना ही जरूरी प्रकृतिबोध भी है। संपादकीय में कहा गया है कि यही वजह है कि सजग और संवेदनशील कवि प्रकृति का साथ कभी नहीं छोड़ता। खराब और आधी-अधूरी कविता के पैरोकार ही यह मानकर चलते हैं कि आज प्रकृति को स्मृति के रूप में याद करके ही लिखा जा सकता है।
यूं तो हिंदी में ढेरों पत्रिकाएं लगातार अपनी उपस्थिति बनाए हुए हैं। लेकिन इन पत्रिकाओं से गुजरना मौजूदा समय की नब्ज से दो-चार होने में मदद तो देता ही है, सांस्कृतिक और वैचारिक दुनिया के नए अनुभवों से लबरेज होने और अपनी नई दृष्टि बनाने में भी मददगार है।

Monday, April 20, 2009

शुरूआती पत्रकारिता के दिनों की एक याद

उमेश चतुर्वेदी
1996 की बात है, तब मैं शावक पत्रकार था, अमर उजाला ग्रुप के आर्थिक अखबार अमर उजाला कारोबार में मेरी नई-नई नौकरी लगी थी। तब के संपादक ने नौकरी देते वक्त मुझसे ट्रेड यूनियन और साहित्यिक-सांस्कृतिक रिपोर्टिंग कराने का वादा किया था। लेकिन बाद में उन्होंने मंडी रिपोर्टिंग के काम पर लगा दिया। मेरे तत्कालीन बॉस ने एक दिन मुझसे कहा कि आप जाकर एशिया के सबसे बड़े हार्डवेयर मार्केट पर स्टोरी करके लाइए। मैंने पता लगाया कि वह मार्केट नई दिल्ली स्टेशन के पास स्वामी श्रद्धानंद मार्ग पर है। अजमेरी गेट की तरफ से मैंने आगे बढ़कर स्वामी श्रद्धानंद मार्ग का रास्ता वहां तैनात एक सिपाही से पूछा। सिपाही ने मुझे ऐसे घूरा- जैसे मुझे खा जाएगा। माजरा नहीं समझ पाया, लिहाजा ये बताने में मैंने देर नहीं लगाई कि पत्रकार हूं। सिपाही का रवैया बदल गया। उसने मुझे आंख के इशारे से रास्ता बता दिया। उसके बताए रास्ते पर आगे बढ़ने के पहले तक मुझे उस रास्ते के हकीकत की जानकारी नहीं थी। लेकिन उस रास्ते पर आगे बढ़ते ही मेरी हैरत का ठिकाना नहीं रहा। श्रद्धानंद जैसे क्रांतिकारी संन्यासी के नाम पर बनी ये सड़क पहले जीबी रोड के नाम पर जानी जाती थी। इसी जीबी रोड के ग्राउंड फ्लोर पर सचमुच एशिया का सबसे बड़ा हार्डवेयर मार्केट फैला पड़ा है। इसी रास्ते के आखिरी छोर पर लाहौरी गेट समेत पुरानी दिल्ली के कई रिहायशी इलाके हैं। इसी रास्ते से घर-परिवार वाले लोग भी रोजाना हाट-बाजार जाते हैं। कभी रिक्शे से तो कभी पैदल, वे निर्विकार भाव से वैसे ही गुजरते हैं – जैसे दूसरे इलाके में वे जाते हैं। बाजार की चमक के बीच अंधेरी सीढ़ियां भी दिख रही थीं और उनसे होकर उपर जो रास्ता जाता है, वहां कोई और ही दुनिया थी। छतों पर खड़ी लड़कियां और महिलाएं बार-बार कुछ वैसे ही बुला रही थीं – जैसे सब्जी बाजार में सब्जी वाले तरकारी और जिंस का भाव लगाते हुए ग्राहकों को बुलाते हैं। तब जाकर मुझे पता चला कि एशिया के सबसे बड़े हार्डवेयर बाजार के छत पर देह का बाजार लगता है। मेरे लिए ये नया अनुभव था। मेरा मन घृणा और विक्षोभ से भर गया। रोटी के लिए अपनी अस्मत की बोली लगाते हुए देखना मेरे लिए ये पहला अनुभव था। उस रात मैं सो नहीं पाया। सारी रात मनुष्य जीवन की मजबूरियां मुझे बेधती रहीं।
बहरहाल मैं रिपोर्टर की हैसियत से गया था और मुझे हार्डवेयर बाजार पर स्टोरी करनी ही थी। लिहाजा मैं मार्केट एसोसिएशन के तत्कालीन अध्यक्ष के पास पहुंचा, लेकिन उनके किसी रिश्तेदार की मौत हो गई थी। लिहाजा उनसे मुलाकात नहीं हुई। तब मैं पूर्व अध्यक्ष के पास पहुंचा। वहां पहुंचा तो श्रद्धानंद मार्ग पुलिस चौकी का हेडकांस्टेबल उनकी चंपूगिरी में मसरूफ था। मैंने पूर्व अध्यक्ष जी को अपना परिचय बताया और मार्केट के बारे में जानकारी मांगी। जानकारी देने की बजाय अपनी दुकान से मुझे बाहर लेकर वे निकल पड़े। वे मुझे लेकर नई दिल्ली से सदर जाने वाली रेलवे लाइन और हार्डवेयर मार्केट के बीच वाले इलाके की ओर चले। ये वाकया नवंबर महीने का है। लेकिन उस खाली जगह में पतझड़ जैसा माहौल था। वहां प्रयोग किए जा चुके कंडोम ऐसे बिखरे पड़े थे, जैसे पतझड़ के दिनों में पेड़ों के नीचे पत्तियां बिखरी होती हैं। एक साथ इतने यूज्ड कंडोम देखकर मुझे उबकाई आने लगी। मैं उल्टे पांव लौट पड़ा। पीछे-पीछे मार्केट एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष की आवाज थी, पहले हमारी इस समस्या पर लिखो तब जाकर कोई दूसरी खबर दूंगा।
एशिया के सबसे बड़े हार्डवेयर मार्केट की चमक-दमक के पीछे कितना कचरा है और उसका छत कितने स्याह अंधेरे से घिरा है, ये मैं तभी जान पाया। उसी दिन मुझे हेड कांस्टेबल ने बताया कि वहां आनेवाले ज्यादातर ग्राहक रिक्शे-ठेले वाले या फिर स्कूलों के जवान होते छात्र होते हैं। ये भी पता चला कि सेना के जवान भी अच्छी-खासी संख्या में यहां अपना दिल बहलाने आते हैं। आप उन्हें रोकते नहीं – मेरे इस सवाल को लेकर हेड कांस्टेबल का जवाब था , उसकी यानी पुलिस वालों की कोशिश होती है कि छात्र कोठों पर जा नहीं पाएं। इसके लिए वे लाठियां भांजने से भी नहीं हिचकते। लेकिन लगे हाथों वह ये भी जोड़ने से नहीं चूका कि यहां आने वाले को कोई रोक पाया है भला।
मैं गांव का हूं...वह भी एक संभ्रांत ब्राह्मण परिवार से ..पारिवारिक संस्कारों ने कोठों के अंधेरे कोने की तहकीकात से रोक दिया। लिहाजा वहां नहीं जा पाया, लेकिन स्याह अंधेरे के पीछे की दुनिया का दर्द समझने में कोई चूक नहीं हुई। दर्द समझने में संस्कार भी कभी बाधक बनते हैं भला .......

Thursday, April 2, 2009

पुस्तक समीक्षा

इतिहास और निजता का संसार
उमेश चतुर्वेदी
इंटरनेट ने चिट्ठियों के संसार पर विराम लगा दिया..रही-सही कसर फोन और मोबाइल फोन ने पूरी कर दी। किसी का हालचाल जानना है तो पंडोरा बॉक्स काफी है। बीएसएनएल की मोबाइल फोन सेवा का उद्घाटन करते वक्त तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने मोबाइल फोन को पंडोरा बॉक्स ही कहा था। पंडोरा बॉक्स के इस चलन के दौर ने निजी अनुभवों...सामयिक पीड़ाओं, राजनीतिक - सामाजिक चिंताओं और अपने उछाह-प्यार को दर्ज कराने का सबसे बड़ा माध्यम रही चिट्ठियों के अस्तित्व पर ही जैसे सवाल उठा दिया है। मोबाइल और इंटरनेट के दौर में हम क्या और कितना कुछ खो रहे हैं – इसका आभास तब हुआ, जब मशहूर कथाकार और ललित निबंधकार विवेकी राय की पुस्तक पत्रों की छांव में से साबका पड़ा। इस किताब में विवेकी राय को लिखे 111 चिट्ठियां तो शामिल हैं। जिन्हें अमृतलाल नागर, रामधारी सिंह दिनकर, भगवत शरण उपाध्याय, धर्मवीर भारती, कुबेरनाथ राय सरीखे नामी और महत्वपूर्ण साहित्यकारों के साथ ही नामी गिरामी हस्तियों ने लिखा है। इसी तरह विवेकी राय के लिखे 29 पत्र भी इस किताब में शामिल हैं।
कम्युनिज्म में भले ही ये मान्यता रही हो कि डीक्लास होने की प्रक्रिया सिर्फ उसके यहां ही है। लेकिन 1978 में विवेकी राय को लिखे एक पत्र में अमृतलाल नागर सरीखा व्यक्ति बताता है कि डीक्लास होने की प्रक्रिया केवल साम्यवादी ही नहीं है – अध्यात्मवादी भीहै तो हैरत होती है। इसी चिट्ठी में अपने उपन्यास मानस का हंस में बुंदेली और अवधी शब्दों को शामिल करने और उन्हें नेचुरल पुट देने की प्रक्रिया भी समझाई है। अपने इस प्रयोग को सही साबित करने के लिए वे कहते हैं कि लेखकों को अपने प्रयोग करते समय किसी हद तक अपने पाठकों का ध्यान रखना चाहिए।
विवेकी राय को लिखी एक और चिट्ठी की ओर भी किताब के सुधी पाठक का ध्यान जाना स्वाभाविक है। इसमें दिनकर की भी एक चिट्ठी है – जिसमें उन्होंने अपनी मशहूर कविता दिल्ली की रचनाप्रक्रिया पर रोशनी डाली है। दिनकर लिखते हैं - “ आपने दिल्ली कविता में जोश का जो उतार देखा है। वह उतार नहीं...चढ़ाव का दृष्टांत है। सुबह के समय फूल पर शबनम होती है, मगर दोपहरी के फूल पर तो शबनम होती ही नहीं।”
विवेकी राय की चिट्ठियों को पढ़ते हुए आपको अनामदास का पोथा में उपसंहार को जल्दीबाजी में लिखने की प्रक्रिया पर हजारी प्रसाद द्विवेदी का स्वीकृतिबोध भी मिल सकता है। ऐसे न जाने कितने दृष्टांत हैं – जो इस पूरी पुस्तक में बिखरे पड़े हैं। यही इस पुस्तक की उपलब्धि है।
हालांकि इस किताब में ढेरों निजी चिट्ठियां भी शामिल हैं। जिनमें उनकी माता जबिति देवी की गंगोत्री यात्रा का जिक्र है। तो कई मित्रों के उलाहने और मजाक भी हैं। कई अति निजी चिट्ठियां भी इस किताब में शामिल हैं। ऐसी ही एक चिट्ठी की कुछ पंक्तियों को यहां शामिल करने का लोभ संवरण करना आसान नहीं है। ये चिट्ठी है उतराखंड शोध संस्थान के पूर्व निदेशक गिरिराज शाह की – जो उन्होंने नैनीताल से 2003 में लिखी थी। गिरिराज शाह लिखते हैं – कभी सोचता हूं, यदि साहित्य साधना के स्थान पर क्रिकेट साधना या अभिनय साधना अथवा नेतागिरी की होती तो शायद सम्मान, संपदा और सुख (राजतिलक) मिलता जैसे अमिताभ बच्चन, लालू, मायावती, मुलायम और जयललिता तथा मदनलाल खुराना ‘खुरोट’ को मिल रहा है। टीवी और मीडिया में नित्य तस्वीर छपती और हिंदुस्तान के सौ करोड़ में से 99 करोड़ 99 लाख मूर्ख तालियां बजाते और चर्चा करते।
कुल मिलाकर ये पुस्तक सन 1940 के दशक से लेकर मौजूदा दौर के साहित्यिक और राजनीतिक इतिहास और कई मशहूर पुस्तकों की रचनाप्रक्रियाओं को जानने – समझने का अच्छा माध्यम बन पड़ी है।
पुस्तक – पत्रों की छांव में
लेखक – विवेकी राय
प्रकाशक – स्वामी सहजानंद सरस्वती स्मृतिकेंद्र
बड़ी बाग, गाज़ीपुर
मूल्य – 150 रूपए

Tuesday, March 24, 2009

किस करवट बैठेगी ब्लॉगिंग की दुनिया !

उमेश चतुर्वेदी
ब्लॉगिंग पर सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले ने ब्लॉगरों के मीडिया के सबसे शिशु माध्यम और उसके कर्ताधर्ताओं के सामने धर्मसंकट खड़ा कर दिया है। अपनी भड़ास निकालने का अब तक अहम जरिया माने जाते रहे ब्लॉगिंग की दुनिया सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से कितना मर्यादित होगी या उस पर बंदिशों का दौर शुरू हो सकता है - सबसे बड़ा सवाल ये उठ खड़ा हुआ है। चूंकि ये फैसला सुप्रीम कोर्ट की ओर से आया है, लिहाजा इस पर सवाल नहीं उठ रहे हैं।
इस लेख का मकसद इस फैसले की मीमांसा करना नहीं है - लेकिन इसके बहाने उठ रहे कुछ सवालों से दो-चार होना जरूर है। इन सवालों से रूबरू होने से पहले हमें आज के दौर के मीडिया की कार्यशैली और उन पर निगाह डाल लेनी चाहिए। उदारीकरण की भले ही हवा निकलती नजर आ रही है – लेकिन ये भी सच है कि आज मीडिया के सभी प्रमुख माध्यम – अखबार, टीवी और रेडियो बाजार की संस्कृति में पूरी तरह ढल चुके हैं। बाजार के दबाव में रणनीति के तहत सिर्फ आर्थिक मुनाफे के लिए पत्रकारिता को आज सुसभ्य और सुसंस्कृत भाषा में कारपोरेटीकरण कहा जा रहा है। यानी कारपोरेट शब्द ने बाजारीकरण के दबावों के बीच किए जा रहे कामों को एक वैधानिक दर्जा दे दिया है। जाहिर है – इस संस्कृति में उतना ही सच, आम लोगों के उतने ही दर्द और परेशानियां सामने आ पाती हैं, जितना बाजार चाहता है। भारत में दो घटनाओं को इससे बखूबी समझा जा सकता है। राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा के निठारी से लगातार बच्चे गायब होते रहे – लेकिन कारपोरेट मीडिया के लिए ये बड़ी खबर नहीं बने। लेकिन उसी नोएडा के एक पॉश इलाके से नवंबर 2006 में एक बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी एडॉबी इंडिया के सीईओ नरेश गुप्ता के बच्चे अंकित का अपहरण कर लिया गया तो ये मीडिया के लिए सबसे बड़ी खबर बन गई। इसके ठीक दो साल बाद मुंबई में ताज होटल पर जब आतंकियों ने हमला कर दिया तो उस घटना के साथ भी मीडिया ने कुछ वैसा ही सलूक किया – जैसा अंकित गुप्ता अपहरण के साथ हुआ। जबकि ऐसी आतंकी घटनाएं उत्तर पूर्व और कश्मीर घाटी में रोज घट रही हैं। नक्सलियों के हाथों बीसियों लोग रोजाना मारे जा रहे हैं। लेकिन इन घटनाओं के साथ मीडिया उतना उतावलापन नहीं दिखाता – जितना अंकित अपहरण या ताज हमला जैसी घटनाओं को लेकर दिखाता रहा है।
मीडिया के ऐसे कारपोरेटाइजेशन के दौर में कुछ अरसा पहले ब्लॉगिंग नई हवा के झोंके के साथ आया और वर्चुअल दुनिया में छा गया। ब्लॉगिंग पर दरअसल वह दबाव नहीं रहा – जो कारपोरेट मीडिया पर बना रहता है। इसलिए ब्लॉगरों के लिए सच्चाई को सामने लाना आसान रहा। इसके चलते ब्लॉगिंग कितनी ताकतवर हो सकती है – इसका अंदाजा तकनीक और आधुनिकता की दुनिया के बादशाह अमेरिका में हाल के राष्ट्रपति चुनावों में देखा गया। ये सच है कि अमेरिकी लोगों को बराक हुसैन ओबामा का बदलावभरा नेतृत्व पसंद तो आया। लेकिन ये भी उतना ही सच है कि उन्हें लेकर लोगों का मानस सुदृढ़ बनाने में ब्लॉगरों की भूमिका बेहद अहम रही। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों के बाद एक सर्वे एजेंसी ने अपनी एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट के मुताबिक तकरीबन साठ फीसदी अमेरिकी वोटरों को ओबामा के प्रति राय बनाने में ब्लॉगिंग ने अहम भूमिका निभाई। इस सर्वे एजेंसी के मुताबिक वोटरों का कहना था कि मीडिया के प्रमुख माध्यमों पर उनका भरोसा नहीं था, क्योंकि उन दिनों ये सारे प्रमुख माध्यम वही बोल रहे थे, जो ह्वाइट हाउस कह रहा था।
ब्लॉगरों की ताकत इराक और अफगानिस्तान में बुश के हमले की हकीकत दुनिया के सामने लाने में दिखी। आप याद कीजिए उस दौर को – तब इंबेडेड पत्रकारिता की बात जोरशोर से उछाली जा रही थी। क्या अमेरिकी – क्या भारतीय – दोनों मीडिया के दिग्गज इसकी वकालत कर रहे थे। जिन भारतीय अखबारों और चैनलों को अमेरिकी सेनाओं के साथ इंबेडेड होने का मौका मिल गया था – वे अपने को धन्य और इस व्यवस्था को बेहतर बताते नहीं थक रहे थे। सारा लब्बोलुआब ये कि इन हमलों को जायज ठहराने के लिए बुश प्रशासन और अमेरिकी सेना जो भी तर्क दे रही थी – दुनियाभर का कारपोरेट मीडिया इसे हाथोंहाथ ले रहा था। लेकिन अमेरिकी ब्लॉगरों ने हकीकत को बयान करके भूचाल ला दिया। ये ब्लॉगरों की ही देन थी कि बुश कटघरे में खड़े नजर आने लगे। उनकी लोकप्रियता का ग्राफ लगातार गिरता गया। और हालत ये हो गई कि 2008 आते –आते जार्ज बुश जूनियर अपने प्रत्याशी को जिताने के भी काबिल नहीं रहे।
भारत में ब्लॉगिंग की शुरूआत भले ही बेहतर लक्ष्यों को हासिल करने को लेकर ही हुई – लेकिन उतना ही सच ये भी है कि बाद में ये भड़ास निकालने का माध्यम बन गया। पिछले साल यानी 2008 की शुरुआत और 2007 के आखिरी दिनों में तो आपसी गालीगलौज का भी माध्यम बन गया। हिंदी के दो मशहूर ब्लॉगरों के बीच गालीगलौज आज तक लोगों को याद है। दो हजार छह के शुरूआती दिनों में तो दो-तीन ब्लॉग ऐसे थे – जिन पर पत्रकारिता जगत के बेडरूम की घटनाओं और रिश्तों को आंखोंदेखा हाल की तरह बताया जा रहा था। किस पत्रकार का किस महिला रिपोर्टर से संबंध है – ब्लॉगिंग का ये भी विषय था। जब इसका विरोध शुरू हुआ तो ये ब्लॉग ही खत्म कर दिए गए।
दरअसल कोई भी माध्यम जब शुरू होता है तो इसे लेकर पहले कौतूहल होता है। फिर उसके बेसिर-पैर वाले इस्तेमाल भी शुरू होते हैं। इस बीच गंभीर प्रयास भी जारी रहते हैं। नदी की धार की तरह माध्यम के विकास की धारा भी चलती रहती है और इसी धारा से तिनके वक्त के साथ दूर होते जाते हैं। हिंदी ब्लॉगिंग के साथ भी यही हो रहा है। आज भाषाओं को बचाने, देशज रूपों के बनाए रखने, स्थानीय संस्कृति की धार को बनाए रखने को लेकर ना जाने कितने ब्लॉग काम कर रहे हैं। तमाम ब्लॉग एग्रीगेटरों के मुताबिक हिंदी में ब्लॉगों की संख्या 10 हजार के आंकड़े को पार कर गई है। इनमें ऐसे भी ढेरों ब्लॉग हैं – जो राजनीतिक से लेकर सामाजिक रूढ़ियों पर चुभती हुई टिप्पणियां करते हैं।
जिस ब्लॉग पर टिप्पणियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला आया है – वह केरल के एक साइंस ग्रेजुएट अजीत का ब्लॉग है। उसने अपनी सोशल साइट पर शिवसेना के खिलाफ एक कम्युनिटी शुरू की थी। इसमें कई लोगों की पोस्ट, चर्चाएं और टिप्पणियां शामिल थीं। इसमें शिवसेना को धर्म के आधार पर देश बांटने वाला बताया गया था। जिसकी शिवसेना ने महाराष्ट्र हाईकोर्ट में शिकायत की थी। जिसके बाद हाईकोर्ट ने अजीत के खिलाफ नोटिस जारी किया था। अजीत ने सुप्रीम कोर्ट से शिकायत की कि ब्लॉग और सोशल साइट पर की गई टिप्पणी के लिए उसे जिम्मेदार ठहराया नहीं जा सकता। लेकिन चीफ जस्टिस के.जी.बालाकृष्णन और जस्टिस पी सतशिवम की पीठ ने कहा कि ब्लाग पर कमेंट भेजने वाला जिम्मेदार है,यह कहकर ब्लागर बच नहीं सकता है। यानी किसी मुद्दे पर ब्लाग शुरू करके दूसरों को उस पर मनचाहे और अनाप-शनाप कमेंट पोस्ट करने के लिए बुलाना अब खतरनाक है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से अनापशनाप लेखन पर रोक तो लगेगी। लेकिन असल सवाल दूसरा है। राजनीति विज्ञान और कानून की किताबों में कानून के तीन स्रोत बताए गए हैं। पहला – संसद या विधानमंडल, दूसरा सुप्रीम कोर्ट के फैसले और तीसरा परंपरा। ये सच है कि जिस तरह ब्लॉगिंग की दुनिया में सरकारी और सियासी उलटबांसियों के परखच्चे उड़ाए जा रहे हैं। उससे सरकार खुश नहीं है। वह ब्लॉगिंग को मर्यादित करने के नाम पर इस पर रोक लगाने का मन काफी पहले से बना चुकी है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय के गलियारों से रह-रहकर छन-छन कर आ रही जानकारियों से साफ है कि सरकार की मंशा क्या है। कहना ना होगा कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से सरकार को अपनी मुखालफत कर रही वर्चुअल दुनिया की इन आवाजों को बंद करने का अच्छा बहाना मिल जाएगा। जिसका इस्तेमाल वह देर-सवेर करेगी ही।
मुंबई हमले के दौरान टेलीविजन पर आतंकवादी के फोनो ने पहले से खार खाए बैठी सरकार को अच्छा मौका दे दिया। टेलीविजन चैनलों पर लगाम लगाने के लिए उसने केबल और टेलीविजन नेटवर्क कानून 1995 में नौ संशोधन करने का मन बना चुकी थी। लेकिन टेलीविजन की दुनिया इसके खिलाफ उठ खड़ी हुई तो सरकार को बदलना पड़ा। लेकिन हैरत ये है कि ब्लॉगरों के लिए अभी तक कोई ऐसा प्रयास होता नहीं दिख रहा।