शुक्रवार, २३ अक्तूबर २००९

अंधेरे खोह में भटकती पत्रकारिता शिक्षा


उमेश चतुर्वेदी
तकनीकी शिक्षण का अपना एक अनुशासन होता है, उसकी अपनी जरूरतें होती हैं। यही कारण है कि इंजीनियरिंग और मेडिकल की ना सिर्फ शिक्षा हासिल करना, बल्कि उनकी शिक्षा देना बेहद चुनौतीभरा काम माना जाता रहा है। अब प्रबंधन की शिक्षा के साथ भी वैसा ही हो रहा है। क्योंकि प्रबंधन भी एक तरह से तकनीक ही है, सिर्फ अकादमिक शिक्षण या पढ़ाई भर नहीं है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि पत्रकारिता की पढ़ाई और उसका शिक्षण तकनीकी शिक्षण-प्रशिक्षण के दायरे में आता है या नहीं। जाहिर है ज्यादातर लोग इसका जवाब हां में ही देंगे। पत्रकारिता की पढ़ाई करने आ रहे छात्र और उनके अभिभावक कम से कम इसे तकनीकी शिक्षण और प्रशिक्षण के दायरे में मान रहे हैं। शायद यही वजह है कि मीडिया विस्फोट के इस दौर में हजारों-लाखों रूपए की मोटी फीस देकर छात्रों की भारी भीड़ पत्रकारिता के शिक्षण संस्थानों का रूख कर रही है। लेकिन डीम्ड विश्वविद्यालयों के साथ ही स्ववित्तपोषित विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों में जिस तरह पत्रकारिता की पढ़ाई हो रही है, उससे साफ है कि अपनी तरह से खास इस अनुशासन की पढ़ाई को लेकर छात्रों और उनके अभिभावकों में ठगे जाने का भाव बढ़ा है। इसका असर भावी पत्रकारों की गुणवत्ता पर भी पड़ रहा है। वैचारिक बहसों में जिस तरह पत्रकारिता इन दिनों निशाने पर है, उसके पीछे पत्रकारिता शिक्षण के मौजूदा ढर्रे की कितनी भूमिका है, इसे लेकर सवाल नहीं उठ रहे हैं। लेकिन अब वक्त आ गया है कि पत्रकारिता शिक्षण को प्रोफेशनल जरूरतों के निकष की बजाय तकनीकी अनुशासन के साथ ही वैचारिक धरातल पर भी परखा जाय।
उदारीकरण के बाद आए मीडिया विस्फोट के इस दौर में जिस तरह तकनीक पर पत्रकारिता अवलंबित होती गई है, इससे साफ है कि बाजार में तकनीकी कसौटी पर खरे उतरने वाले भावी पत्रकारों की मांग बढ़ गई है। सिर्फ इसी एक आधार के चलते खबरनवीसी के शिक्षण को इंजीनियरिंग और मेडिकल की तरह तकनीकी अनुशासन का शिक्षण और प्रशिक्षण माना जा सकता है। चूंकि पत्रकारिता इंजीनियरिंग और मेडिकल की तरह कोरा तकनीक ही नहीं है, बल्कि यहां वैचारिकता ना सिर्फ पूंजी है, बल्कि एक बड़ा औजार भी है। हिंदी पत्रकारिता के शलाका पुरूष राजेंद्र माथुर भले ही कहते रहें कि पत्रकार इतिहास निर्माता नहीं, बल्कि उसके ऐसे दर्शक होते हैं, जो अपनी पैनी निगाह के जरिए आम लोगों को इन घटनाओं से परिचित कराते हैं। लेकिन ये भी सच है कि अपनी वैचारिकता की पूंजी के जरिए हासिल नजरिए के चलते वे मौजूदा घटनाओं के प्रति लोगों को सचेत या फिर उत्साहित भी करते हैं। ताकि आने वाला कल जब विगत के कल का इतिहास के तौर पर मूल्यांकन करे तो उसे कोई पछतावा ना रहे। जाहिर है ये दृष्टि किसी विश्वविद्यालय या पत्रकारिता शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थान के क्लासरूम से हासिल नहीं किए जा सकते। अगर ऐसा होता तो भारतीय पत्रकारिता के शुरूआती पुरूष चाहे जेम्स ऑगस्टस हिक्की हों या अंबिका प्रसाद वाजपेयी या फिर बाबू राव विष्णुराव पराड़कर, उन्हें पत्रकारिता की दुनिया में याद भी नहीं किया जाता। क्योंकि उन्होंने किसी संस्थान से खबरनवीसी या वैचारिकता की ट्रेनिंग हासिल नहीं की थी। आज के दौर में भी प्रभाष जोशी, अच्युतानंद मिश्र, प्रणय रॉय या विनोद दुआ जैसे कई चमकते नाम हैं, जिनकी पत्रकारिता का प्रशिक्षण किसी विश्वविद्यालय या संस्थान में मिला हो। बहरहाल आज के दौर में बिना खास शिक्षण या प्रशिक्षण के किसी पत्रकार की उम्मीद नहीं की जाती, जैसे बिना किसी इंजीनियरिंग की पढ़ाई के इंजीनियर या मेडिकल की पढ़ाई के डॉक्टर की उम्मीद की जाती है। अगर ऐसा होगा तो उस पर सवाल उठने लाजिमी हैं। हकीकत में आज का पत्रकारिता शिक्षण अपने उहापोह से मुक्त नहीं हो पाया है। उसकी कोशिश या खुला ध्येय है प्रणय रॉय और प्रभाष जोशी जैसा पारंपरिक और श्रेष्ठ वैचारिक पत्रकार बनाना है, जो आज की तकनीक पर भी खरा उतरे। लेकिन उसका सबसे बड़ा संकट ये है कि वह अब तक ये तय नहीं कर पाया है कि पत्रकारिता का प्रशिक्षण तकनीकी है या वैचारिक। इसके लिए जितना पत्रकारिता के संस्थान जिम्मेदार हैं, उतना ही दोषी सरकार भी है। अगर ऐसा नहीं होता तो आज तक पत्रकारिता का एकनिष्ठ पाठ्यक्रम तैयार हो चुका होता। इंजीनियरिंग और दूसरे तकनीकी संस्थानों की मान्यता के लिए बाकायदा तकनीकी शिक्षा परिषद है, मेडिकल की पढ़ाई पर निगाह रखने के लिए मेडिकल कौंसिल है। लेकिन इतिहास पर निगाह रखने वाली पढ़ाई के लिए ऐसी कोई रेग्युलेटरी संस्था नहीं है। यही वजह है कि कुकुरमुत्तों की तरह उगे डीम्ड विश्वविद्यालयों और कथित तकनीकी संस्थानों के साथ पत्रकारिता पढ़ाने के लिए मैदान में कूद पड़े हैं। इस कड़ी में स्ववित्त पोषित योजना के तहत जाने-माने विश्वविद्यालय भी शामिल हो चुके हैं। इसका असर है कि अधिकांश संस्थानों के पास किताबों और लैब का जबर्दस्त टोटा है। लेकिन पढ़ाई चालू है। निजी संस्थान मोटी फीस के बदले ढेरों सब्जबाग दिखा रहे हैं। वहीं स्ववित्तपोषित विभागों के नाम पर विश्वविद्यालयों या पुराने कॉलेजों में पत्रकारिता विभाग कम फीस ले रहे हैं। लेकिन सुविधाओं के मामले में उनकी भी वही हालत है, जो चमकती बिल्डिंग वाले निजी संस्थानों की है।
अव्वल तो अधिकांश संस्थानों या विश्वविद्यालयों में कोई मानक पाठ्यक्रम ही नहीं है। रही बात उन्हें पढ़ाने वालों की तो योग्यता की कसौटी पर खरे उतरने वाले कम ही लोग भावी पत्रकारों को पढ़ाने में जुटे हैं। स्ववित्तपोषित संस्थानों के तौर पर जिन विश्वविद्यालयों या कॉलेजों में पत्रकारिता की पढ़ाई हो रही है, वहां पत्रकारिता विभाग या तो हिंदी विभाग की दासी है या फिर अंग्रेजी विभाग का दोयम दर्जे का साथी। हिंदी या अंग्रेजी विभाग के ठस्स विद्वान अपने को पत्रकारिता का पुरोधा भी मान बैठे हैं। उन्हें बाजार और तकनीक से कुछ लेना-देना नहीं है। उनके लिए पत्रकारिता का शिक्षण शेक्सपीयर के नाटकों या प्रेमचंद की कहानियों की पढ़ाई जैसा ही है। उन्हें ये भी पता नहीं है कि पत्रकारिता शिक्षण की दुनिया में क्रॉफ्ट और अकादमिक नजरिए को लेकर कोई बहस भी चल रही है। भारतीय पत्रकारिता खास तौर पर तकनीक और कंटेंट के साथ पहुंच के स्तर पर किस पायदान पर जा पहुंची है, इसका साफ अंदाजा अधिकांश पत्रकारिता संस्थानों और वहां पढ़ा रहे लोगों को नहीं है। जाहिर है इसका खामियाजा वह पीढ़ी भुगत रही है, जो जेम्स हिक्की या अंबिका प्रसाद वाजपेयी ना सही, प्रभाष जोशी और प्रणय रॉय बनने के लिए पत्रकारिता की पढ़ाई के समंदर में कूद पड़ी है।
जहां ठीक-ठाक पत्रकारिता शिक्षण हो रहा है, वहां क्रॉफ्ट और अकादमिक जोर को लेकर रस्साकशी जारी है। जिन अध्यापकों का प्रोफेशनल पत्रकारिता से साबका नहीं पड़ा है, वे संचार के सिद्धांतों के पारायण और पाठ से छात्रों को जोड़ना अच्छा लगता है। लेकिन विजिटिंग फैकल्टी के नाम पर प्रोफेशनल जब क्लास रूम में आते हैं तो वे तकनीक पर ही जोर देते हैं। जाहिर है उनके शिक्षण का मुख्य फोकस तकनीकी जानकारी और तकनीक के आधार पर कंटेंट को कसना सिखाना होता है। अगर वे अखबार से हुए तो उनकी दुनिया जनसत्ता और टाइम्स ऑफ इंडिया के न्यूज रूम के इर्द-गिर्द ही घूमती है। अगर टेलीविजन की दुनिया से हुए तो जी न्यूज, एनडीटीवी या आजतक का न्यूजरूम ही उनका आदर्श होता है। इस असर से पत्रकारिता प्रशिक्षण पाने के बाद प्रोफेशनल संस्थानों में ट्रेनिंग के लिए जाने वाले छात्र बच नहीं पाते। उन्हें मुंह बिचकाकर उनकी सैद्धांतिक पढ़ाई का मजाक उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती। क्रॉफ्ट और अकादमिक को लेकर अतिवादी जोर दरअसल एक तरह का अतिवाद ही है। हर तकनीक और क्रॉफ्ट का अपना एक सिद्धांत भी होता है। अकादमिक दुनिया को इस सैद्धांतिकता के आधार को खोजना और उसकी कसौटी पर क्रॉफ्ट को विश्लेषित करना होता है। इस तरह से पढ़े और गुने छात्रों में जो दृष्टि विकसित होती है, उसमें मौलिकता की गुंजाइश ज्यादा होती है। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो रहा है। जिसका असर आज पत्रकारिता की प्रोफेशनल जिंदगी में खूब दिख रहा है। सवालों के घेरे में पत्रकारिता रोज आ रही है। नई पीढ़ी के पत्रकारों में मौलिक दृष्टि का अभाव साफ नजर आता है। अगर मौलिकता दिखती भी है तो उन्हें प्रयोग करने के लिए जरूरी समर्थन देने वाले साहसी सीनियर की भी कमी साफ नजर आती है।
साफ है तकनीक और अकादमिक के झंझट से मुक्त हुए बिना पत्रकारिता की अपनी वैचारिक जरूरत पर आधारित पत्रकारिता शिक्षण के इंतजाम नहीं किए जाएंगे, सवाल तो उठते ही रहेंगे। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय ने पत्रकारिता शिक्षण की इसी कमी को ध्यान में रखते हुए प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सहयोग से पत्रकारिता पाठ्यक्रम में एकरूपता लाने और संस्थानों के साथ ही पढ़ाने वाले लोगों और संस्थानों के मानकीकरण की दिशा में कदम उठाया है। जरूरत इस बात की है कि प्रोफेशनल दुनिया की जरूरतों के मुताबिक पत्रकारिता शिक्षा ढले, लेकिन अकादमिकता को भी नजरंदाज ना किया जाए। जड़ नजरिए वाली अकादमिकता के बोझ तले दबा पत्रकारिता शिक्षण ना तो अकादमिक दुनिया के लिए मुफीद होगा ना ही अखबारी और टीवी संस्थान को ही फायदा पहुंचा पाएगा। और पत्रकारिता की मेधा का जो नुकसान होगा, उसका आकलन तो आने वाली पत्रकारीय पीढ़ियां ही कर पाएंगी।

मंगलवार, १५ सितम्बर २००९

नहीं रूक पाएगा हिंदी का कारवां


उमेश चतुर्वेदी
सितंबर के महीने जैसे-जैसे नजदीक आता जाता है, सरकारी दफ्तरों के उस खास विभाग की रौनक बढ़ाने की कवायद शुरू हो जाती है, जिसे हिंदी अथवा राजभाषा विभाग कहा जाता है। ऐसे माहौल में हिंदी के पाखंड दिवस के करीब एक पखवाड़ा पहले केंद्र सरकार का मंत्री हिंदी की पढ़ाई को जरूरी बनाने की हिमायत करता हुआ बयान दे तो हैरत होना स्वाभाविक ही है। मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल के इस बयान पर शक की गुंजाइश भी इसलिए ज्यादा है, क्योंकि हिंदी ऐसे बयानों के जरिए करीब उनसठ साल से ठगी जाती रही है। राजभाषा को हकीकत में वह हक अब तक नहीं मिल पाया, जिसकी वह स्वाभाविक तौर पर हकदार है।
राजनीतिक बयानों की गंभीरता को हमेशा इतिहास और विगत के कदमों के आधार पर परखा जाता रहा है। लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि कपिल सिब्बल अंग्रेजी के धुआंधार वक्ता हैं। कांग्रेस पार्टी का प्रवक्ता रहते उन्होंने प्रेस को अपनी पार्टी से संबंधित जितनी जानकारियां अंग्रेजी के जरिए दी थीं, शायद ही हिंदी में दी होंगी। संसद में भी चाहे विपक्षी सदस्य के तौर पर बहस में हिस्सेदारी रही हो या फिर मंत्री के तौर पर बहसों का जवाब देना, कपिल सिब्बल अंग्रेजी को ही सहज मानते रहे हैं। ऐसे कपिल सिब्बल अगर देशभर के स्कूलों में हिंदी पढ़ाए जाने की वकालत कर रहे हैं तो इसे सामान्य बयान भर मानकर उपेक्षित नहीं किया जाना चाहिए।
दरअसल कपिल सिब्बल के इस सुझाव की वजह जो चिंताएं हैं, उसी पखवाड़े राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रमुख कुप सी सुदर्शन ने जाहिर किया है। कांग्रेस के एक मुखर नेता के साथ संघ के पूर्व प्रमुख के बयानों को जोड़ना कुछ लोगों को भले ही गलत लग सकता हो। लेकिन हकीकत यही है। सुदर्शन ने कहा है कि अंग्रेजियत इस देश की संस्कृति को बिगाड़ तो रही ही है, देश में एकता की भावना पर भी असर डाल रही है। कपिल सिब्बल ने भी जब हिंदी पढ़ाने की वकालत की तो उनका भी यही कहना था कि हिंदी की पढ़ाई के जरिए देशभर के बच्चे एकता के सूत्र में बंध सकेंगे।
ये कड़वी सचाई है कि सरकारी कोशिशों के जरिए हिंदी अपना असल मुकाम हासिल नहीं कर पाई। दूसरे शब्दों में कहें तो हिंदी को उसके असल मुकाम पर पहुंचाने में सरकारी खेल ने ज्यादा अड़ंगा लगाया। हिंदी को दासी बनाए रखने की सरकारी कवायद की शुरूआत 1965 में ही हो गई थी, जब भाषा संबंधी संसद के संकल्प में ये तय कर दिया गया कि जब तक एक भी राज्य सरकार हिंदी के राजभाषा होने का विरोध करती रहेगी, उसे व्यवहारिक तौर पर राजभाषा नहीं बनाया जा सकेगा। सच तो ये है कि ये संकल्प बाद में आया, लेकिन उसकी पूर्व पीठिका 21 नवंबर 1962 को ही बन गई थी। इस दिन गठित नगालैंड राज्य की राजभाषा ही अंग्रेजी है। जाहिर है कि नगालैंड जैसे राज्य हिंदी को क्योंकर अपनाने लगे। साठ के दशक में तमिलनाडु में उभरे हिंदी विरोध के लिए गुलजारी लाल नंदा के एक आदेश को जिम्मेदार माना जाता है। मशहूर पत्रकार कुलदीप नैय्यर ने अपनी पुस्तक स्कूप में इस घटना का जिक्र किया है। दरअसल संवैधानिक प्रावधानों के चलते 26 जनवरी 1965 से हिंदी को राजभाषा के तौर पर अंग्रेजी का स्थान ले लेना था। इसे देखते हुए ही बतौर राजभाषा विभाग के इंचार्ज मंत्री के नाते नंदा ने ये आदेश दिया था। लेकिन पहले से जारी केंद्रीय सत्ता में हिंदी विरोध की मानसिकता के चलते तमिलनाडु के नेताओं को ये प्रचारित करने का मौका मिल गया कि केंद्र सरकार गैरहिंदी भाषी राज्यों पर जबर्दस्ती हिंदी थोपना चाहती है। नंदा जी को अपनी गलती का अहसास हुआ और यह आदेश वापस ले लिया गया। लेकिन जो गलती होनी थी, वह हो गई थी। जिसका खामियाजा तमिलनाडु में खूनी संघर्ष के तौर पर दिखा। आंदोलन की रिपोर्टिंग करने दिल्ली से पहुंचे पत्रकारों को तब के मद्रास और अब के चेन्नई में ऑटो वालों से अपने हिंदी सवालों के जवाब में हिंदी में ही सुनने को मिला – हम हिंदी नहीं जानता। यानी हिंदी जानने वाला भी अपनी क्षेत्रीय अस्मिता और स्थानीय राष्ट्रवाद को बचाने के नाम पर हिंदी का विरोधी हो गया था। इस आंदोलन ने तमिलनाडु में सरकारी तौर पर ना सिर्फ हिंदी को लागू नहीं होने दिया, बल्कि केंद्र सरकार को हिंदी की उसकी असल जगह पर बैठाने के अपने संकल्प को अनंत काल तक टालने का मौका जरूर दे दिया।
सरकारी षडयंत्र के चलते हिंदी व्यवहार में राजभाषा भले नहीं बन पाई, लेकिन 1991 में शुरू हुए उदारीकरण के दौर ने हिंदी को नई पहचान दिलाई। बेशक यह नीति बनाने वालों की भाषा नहीं बन पाई है, लेकिन बाजार की सबसे प्रमुख भाषा जरूर बन गई। और तो और जिस राज्य ने हिंदी विरोध के नाम पर खून बहाया, बसें जलाईं और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया, अब उस तमिलनाडु के लोग भी अपने बच्चों को हिंदी पढ़ाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। पिछले दिनों एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक के चेन्नई संवाददाता ने खबर दी कि साठ के दशक के हिंदी विरोधी आंदोलनकारी पीढ़ी भी अब अपने बच्चों को हिंदी पढ़ाने के लिए बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही है। तमिलनाडु में बदलाव की ये बयार की असल वजह उदारीकरण ही है। इसी के चलते 1995 में दुनिया की जिन पांच भाषाओं को स्टार समूह के मालिक रूपर्ट मर्डोक ने भविष्य की ताकतवर भाषाएं बताया था, उसमें हिंदी भी थी। मर्डोक जानते थे कि हिंदी में बाजार को दुहने की अकूत ताकत है। यही वजह है कि स्टार समूह के चैनलों का भारतीय आसमान पर हमला हुआ और देखते ही देखते स्टार समूह भारत की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया क्रांति का अगुआ बन गया। हमारे शासक भले ही हिंदी को नकारते रहे, लेकिन जिनकी बदौलत हिंदी अपने अहम स्थान से दूर हुई, उसी शासक वर्ग अंग्रेज कौम के ही एक प्रभावी शख्स ने हिंदी की ताकत को पहचानने में भूल नहीं की।
आज अगर कपिल सिब्बल हिंदी की वकालत कर रहे हैं तो इसकी वजह ये नहीं है कि उनकी पार्टी के पहले के कर्ताधर्ताओं ने जो किया, उसे लेकर उनके मन में कोई पश्चाताप है। या फिर वे उस भूल को सुधारना चाहते हैं। हकीकत तो यही है कि अंग्रेजियत के वर्चस्व के इस दौर में भी हिंदी अपनी ताकत बढ़ाती जा रही है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, गुजरात से लेकर उस नगालैंड तक, जिसकी राजभाषा अंग्रेजी है, हिंदी को जानने-बोलने, समझने और गुनगुनाने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। सर्वोच्च अदालतों तक में उसे लागू करने के लिए मांग बढ़ती जा रही है। दिल्ली हाईकोर्ट में हिंदी में सुनवाई और इंसाफ को लेकर तीन हजार से ज्यादा वकीलों का मैदान में कूद पड़ना कोई कम नहीं है। जाहिर है, अपने विस्तार में हिंदी का सहारा लेकर ताकतवर बना बाजार अब हिंदी को भी ताकतवर बना रहा है। ये ताकत ही है कि हिंदी को लेकर अंग्रेजी दां लोगों तक का रवैया बदलता नजर आ रहा है। इससे साफ है कि आने वाले दिनों में हिंदी की जयजयकार बढ़ती ही जाएगी। जरूरत इस बात की है कि खांटी हिंदी वाले भी इस तथ्य को समझें और अपनी ताकत को सकारात्मक तरीके से इस नेक काम में लगाएं।

रविवार, २३ अगस्त २००९

अंदरखाने में भी हुई डील


उमेश चतुर्वेदी
यह लेख प्रथम प्रवक्ता के 01 सितंबर 2009 के अंक में प्रकाशित हुआ है।
भारतीय लोकतंत्र में इस बात पर शक नहीं है कि इस देश का सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री का पद है। जाहिर है उन्हें नियंत्रित करने वाली पार्टियों के अध्यक्ष की ताकत भी कम नहीं होगी। इस देश में शायद ही कोई मानेगा कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके निर्देशन में काम करने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी मीडिया के सामने कमजोर होंगे। लेकिन ये सोलह आने सही है कि पिछले आम चुनावों में देश की सत्ता संभाल रहे ये दोनों दिग्गज भी कमजोर साबित हुए। चुनावी समर के दौरान सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को भी मीडिया को अंदरखाने में पैकेज देना पड़ा। नाम ना छापने की शर्त पर कांग्रेस पार्टी के ही एक रसूखदार नेता को इस तथ्य को स्वीकार करने से गुरेज नहीं है।
चुनाव के दौरान प्रत्याशियों के पक्ष में खबर छापने और पैसे या पैकेज डील ना करने वाले प्रत्याशियों की खबरों को सिरे से नकार देने का आरोप तो मीडिया पर लग ही रहा है। पैसे कमाने की इस बहती गंगा में हाथ धोने में देश के कई बड़े मीडिया घरानों के बारे में खुलेआम सवाल-जवाब हो ही रहे हैं। इसे लेकर आरोपी मीडिया को भी बचाव में उतरना पड़ा है। लेकिन ये भी सच है कि एक-एक वोट के जुगाड़ में लगी कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी जैसी पार्टियों ने मीडिया के एक बड़े धड़े की इस जायज-नाजायज मांग के आगे घुटने टेकने में ही अपनी भलाई समझी। भारतीय जनता पार्टी के सांसद और वरिष्ठ पत्रकार चंदन मित्रा देश के बड़े खबरिया चैनलों पर आरोप लगा ही चुके हैं कि उन्होंने एक संगठन बनाकर पार्टियों से विज्ञापन बटोरे। लेकिन कांग्रेस नेता का खुलासा इससे आगे की बात बता रहा है। उन्होंने कहा कि कई बड़े चैनलों ने अंदरखाने में उनसे बिना किसी रसीद और पक्की खाता-बही के भी पैसे लिए। इसमें कई बड़े और नामी पत्रकार भी शामिल हैं। उत्तर प्रदेश के एक नेता ने भी नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि एक चैनल ने तो बाकायदा बीएसपी के नेताओं से भी अंदरखाने में डीलिंग की। जिसमें उसके संपादक का ही बड़ा हाथ रहा।
वैसे स्थानीय और जिला स्तर पर ऐसे आरोप पहले भी लगते रहे हैं। कुछ तथ्यों में सच्चाई भी रही है। कुछ एक लोग राष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसा करते रहे होंगे। लेकिन आमतौर पर पत्रकारिता के मूल मानदंडों का खयाल रखा जाता था। लेकिन इस बार इसे खुलकर स्वीकार किया गया, यही वजह है कि इस बार सवाल भी ज्यादा उठ रहे हैं। वैसे सच तो ये है कि मध्य प्रदेश के एक अखबार ने 1996 के स्थानीय चुनावों में अपनी जिला यूनिटों को प्रत्याशियों से कमाई का लक्ष्य दिया था। जिसने नहीं दिया, उनका अखबार ने बॉयकाट किया और इसकी कीमत उन प्रत्याशियों को चुकानी पड़ी थी। लेकिन कमाई का ये रास्ता चल निकला तो इसे मीडिया घरानों ने अपनाने में देर नहीं लगाई।
धीरे-धीरे ये रोग पूरे देश में फैलने लगा। पंजाब के पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के एक प्रचार प्रभारी को इस नई परिपाटी से पहली बार साबका पड़ा। अब तक वे जानते थे कि प्रचार के लिए राज्य या राष्ट्रीय मुख्यालय से अपने लक्ष्य समूह वाले अखबारों और टीवी चैनलों को विज्ञापन जारी किया जाता है। लेकिन उस विधानसभा चुनाव में पहली बार उन्हें पता चला कि मीडिया घरानों ने अपनी जिला यूनिटों को लक्ष्य दे रखे थे। अब मरता पत्रकार क्या ना करता, लिहाजा दो-दो तीन-तीन संस्थानों के स्थानीय पत्रकारों ने आपस में गुट बनाकर खुद की मार्केटिंग की और दबाव बनाकर उनसे विज्ञापन की मांग की। इसके कुछ महीनों बाद गुजरात में विधानसभा चुनाव हुए। जब वे गुजरात के चुनाव प्रचार के समंदर में उतरे तो वहां भी पत्रकारीय भ्रष्टाचार की इस गंगा से साबका पड़ा। रही-सही कसर लोकसभा चुनावों में पूरी हो गई। लिहाजा अब तो वे मान के चलते हैं कि हर राज्य में उन्हें ऐसा ही अनुभव होने वाला है।
जिस तरह से मीडिया के एक वर्ग की जायज-नाजायज मांगों के सामने बड़े – बड़े दलों के बड़े नेताओं तक को झुकना पड़ा, उससे साफ है कि आज मीडिया कितना ताकतवर हो गया है और एक-एक वोट की जुगत में जुटे नेताओं के लिए ऐसे मीडिया को नकारना भी उनके लिए आसान नहीं रहा। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल ये है कि भ्रष्टाचार पर सवाल उठाने की ताकत रखने वाले मीडिया संस्थान इस परिपाटी के बाद क्या सरकार और नेताओं पर उसी आक्रामकता से सवाल उठा सकेंगे। इसका जवाब पाना फिलहाल आसान नहीं लगता। लेकिन इसके साथ ये भी सच है कि जो पार्टी या उसके ताकतवर नेता मीडिया की इस नाजायज मांग के सामने झुक सकते हैं, क्या गारंटी है कि वे देश के उन अहम मसलों को शिद्दत से हल कर पाएंगे, जिनके लिए मजबूती और दृढ़ता की जरूरत होती है।
साफ है कि ये मान्यताओं और उसूलों पर संकट का दौर है। लेकिन ये भी सच है कि संकट के दौर ही नए उसूलों, मजबूत परंपराओं और मानवीय मूल्यों की स्थापना की नई राह भी सुझाते हैं। जब हिंदी पत्रकारिता के शलाका पुरूष और नौजवान पत्रकारों की टोली इसके खिलाफ आवाज उठाने में नहीं हिचक रही है तो नई उम्मीद का दीया जलाना गलत नहीं होगा।

बुधवार, २९ जुलाई २००९

निजीपन में सेंध यानी सच का सामना


उमेश चतुर्वेदी
कड़वी सचाई का सामना बहादुर ही कर पाते हैं। बचपन से ही हमें ये बताया जाता रहा है। ये शिक्षा हमें देते वक्त इस बात की भी ताकीद की जाती रही है कि जब तक उस सचाई के उजागर होने से व्यापक समुदाय का हित न जुड़ा हो, चाहे कितना भी कड़वी हकीकत क्यों ना हो, उसका खुलासा नहीं किया जाना चाहिए। पारंपरिक मीडिया इसे सूत्र वाक्य की तरह लेता रहा है। यही वजह है कि किसी व्यक्ति विशेष की निजी जिंदगी में ताक-झांक करने से देसी मीडिया बचता रहा है। इसी सूत्र वाक्य के सहारे सत्तर के दशक में भारतीय मीडिया ने भी राजनेताओं की जिंदगी के काले सच को उजागर करना शुरू किया तो राजनीति की दुनिया में भूचाल आ गया था। तब से जब भी मौका लगता है, राजनीति मीडिया के ऐसे कामों पर सवाल उठाने से पीछे नहीं रहती। लेकिन दिलचस्प बात ये है कि इस बार राजनीति की दुनिया से जुड़े लोगों की निजी जिंदगी के अंधेरे पक्ष का खुलासा नहीं हो रहा है, बल्कि इस बार सवालों से मुठभेड़ करने आम और खास हर तरह के लोग खुद आ रहे हैं और राजनीति की दुनिया में भूचाल आ गया है। 22 जुलाई को राज्य सभा में जिस तरह स्टार प्लस के कार्यक्रम सच का सामना पर दलगत राजनीति से उपर उठकर राजनेताओं ने सवाल उठाया है, उससे तो कम से कम यही ध्वनि निकलती है।
14 जुलाई को कलर्स के लोकप्रिय सीरियल बालिका वधू पर लोकसभा में जिस तरह बड़े नेताओं ने सवाल उठाया, उससे सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने बालिका वधू की मानिटरिंग का आदेश ही दे डाला। ये क्या संजोग है कि जिस सच का सामना जैसे रियलिटी शो पर संसद में सवाल उठा है, वह इसके ठीक अगले दिन यानी 15 जुलाई को शुरू हुआ। बहरहाल सरकार ने सच का सामना की मानिटरिंग का कोई खुला आदेश तो नहीं दिया है। लेकिन जिस तरह सीरियलों की भूमिका पर संसद में चर्चा कराने के लिए सरकार तैयार हो गई है, उससे साफ है कि आने वाले दिन ऐसे सीरियल निर्माताओं के लिए परेशानियां लेकर आ सकते हैं।
22 जुलाई को राज्य सभा में समाजवादी पार्टी के सांसद कमाल अख्तर को आपत्ति थी कि सच का सामना में अश्लील सवाल पूछे जा रहे हैं और इससे भारतीय संस्कृति का खुला उल्लंघन हो रहा है। इसके साथ ही व्यक्ति की निजता में भी सेंध लगाई जा रही है। मंडल- कमंडल से लेकर आर्थिक मुद्दों पर अलग-अलग राय रखने वाले अपने राजनीतिक दलों की एक बात के लिए जरूर दाद दी जानी चाहिए। जब भी भारतीय संस्कृति पर हमले की बात होती है, सारे दल एक साथ खड़े नजर आते हैं। सच का सामना चूंकि राजनीतिक दलों की नजर में भारतीय संस्कृति का उल्लंघन कर रहा है, लिहाजा इसके खिलाफ पूरी राज्यसभा एकमत नजर आई।
संसद में सच का सामना को लेकर चर्चा होगी तो इससे जुड़े तमाम मुद्दे सामने तो आएंगे ही। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या सचमुच इसके लिए सिर्फ स्टार प्लस चैनल ही जिम्मेदार है। जिस अमेरिकी कार्यक्रम की तर्ज पर भारतीय लोग सच का सामना कर रहे हैं, उसके मूल देश में व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता का संवैधानिक तौर पर खास खयाल रखा गया है। वहां भी यह कार्यक्रम विवादास्पद रहा है। लेकिन इससे इस कार्यक्रम में शामिल होने आए लोग अपनी जवावदेही से बच नहीं सकते। इस कार्यक्रम में शामिल हो रहे लोग मासूम और अनपढ़ नहीं हैं। विनोद कांबली को आप क्या मासूम मानेंगे। जिस स्मिता नाम की महिला से उसकी सेक्स फैंटेसी के बारे में पूछे गए सवाल को लेकर संसद में सवाल उछला है, वह भी मासूम नहीं रही हैं। जिस तरह की परिपाटी आज के टेलीविजन की दुनिया में पसरी हुई है, उससे ऐसे सवालों का अंदाजा लगाना किसी समझदार व्यक्ति के लिए कोई कठिन काम नहीं है। साफ है ये लोग पढ़े-लिखे और समझदार हैं और उन्हें एक करोड़ रूपए जीतने का सपना अपनी निजी जिंदगी की सार्वजनिक चीड़फाड़ के लिए तैयार कर रहा है।
ये सच है कि साल भर पहले तक मनोरंजन चैनल की दुनिया का बेताज बादशाह रहा स्टार प्लस अपनी लोकप्रियता बनाए रखने के लिए इन दिनों जूझ रहा है। इसके चलते उसे अपनी प्रोग्रामिंग में ताजगी लाने के लिए मजबूर होना पड़ा है। जैसा कि अपने यहां परिपाटी है, आइडिया की ताजगी हमें अमेरिका में ही मिलती- दिखती है। लिहाजा वह अमेरिकी कार्यक्रम की तर्ज पर इस कार्यक्रम को लाने के लिए मजबूर हुआ है। चैनल को भी ये अंदाजा रहा होगा कि सचाई का सामना करने वाले लोगों को चाहे ज्यादा परेशानी ना हो, देश में इसे लेकर बवाल जरूर होगा और फिर कार्यक्रम चर्चा में आएगा। और चर्चा में आएगा तो उसकी टीआरपी बढ़ेगी ही। यह टीआरपी की ही माया है कि उसे लोगों की निजी जिंदगी में आक्रामक तरीके से घुसने के लिए मजबूर कर रहा है और उसकी यही मजबूरी खटकने लगी है।
खबरिया चैनलों की बढ़ती भीड़ के भी दौर में स्टिंग और निजी जिंदगी में दखलंदाजी का जोर बढ़ गया था। यह परिपाटी इतनी तेजी से बढ़ी कि लोगों ने इस पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। तब खबरिया चैनलों को गैरजिम्मेदार ठहराने में हर दूसरा व्यक्ति आगे आ रहा था। मुंबई पर हमले के बाद खबरिया चैनलों में ऐसे चलन कम हुए हैं। उन्हें खबरों की विमर्श वाली दुनिया में गोते लगाने के लिए लौटना पड़ा है। लेकिन हकीकत देखिए कि ऐसे कार्यक्रमों से अब तक बचे रहे मनोरंजन चैनलों को भी इसी दौ़ड़ में शामिल होना पड़ा है, और उनकी भी वजह वही है, प्रतिद्वंद्विता और टीआरपी की चाह। राज्यसभा में उन पर उठा सवाल दरअसल खबरिया चैनलों के साथ शुरू हुए टीवी प्रोग्रामिंग के विरोध का ही विस्तार है।
संसद में चर्चा के बाद इस कार्यक्रम को जायज ठहराया जाएगा या फिर गलत, लेकिन एक चीज साफ है कि इस बहस में वे मुद्दे भी उठेंगे, जिसकी वजह से आज आम आदमी अपने गोपनीय चीजों को भी उजागर करने के लिए मजबूर हुआ है। उदारीकरण की हवा में, जब हर किसी चीज का पैमाना पैसा बन गया है, ऐसे में एक करोड़ का लालच चाहे कोई टीवी चैनल दे या फिर कोई और, ऐसे कार्यक्रमों पर रोक लगा पाना आसान नहीं होगा। लेकिन ये भी सच है कि अगर हर तरह के कार्यक्रमों के लिए सरकारी दखलंदाजी बढ़ती रही तो चाहे खबरिया चैनल हों या फिर मनोरंजन के चैनल, उनके लिए सही तरीके से काम कर पाना आसान नहीं होगा। लेकिन इसके बचाव की राह क्या होगी, इस पर बेहतर हो कि सरकार या संसद की बजाय मीडिया और उसके कर्ता-धर्ता खुद विचार करें।

सोमवार, २० जुलाई २००९

बालिका वधू पर सवाल


उमेश चतुर्वेदी
14 जुलाई को लोकसभा में सवाल भर्तृहरि महताब का था...जवाब अंबिका सोनी ने दिया ...लेकिन उनका जवाब पूरा होने का जैसे जनता दल यू के अध्यक्ष शरद यादव कर रहे थे। उन्होंने छूटते ही बालिका वधू पर शारदा एक्ट के उल्लंघन और इसके जरिए बाल विवाह को बढ़ावा देने का आरोप जड़ दिया। शरद यादव कोई मामूली नेता नहीं हैं, लिहाजा अंबिका सोनी को कहना पड़ा कि वे इस पर विचार करेंगी। यानी बालिका वधू पर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने निगरानी या तो शुरू कर दी है या फिर वह जल्द ही करने वाला है। जाहिर है, यदि मंत्रालय को ऐसा लगा तो टेलीविजन की सबसे मासूम और नन्हीं बहू को देखने के आदी रहा एक बड़ा दर्शक वर्ग इससे वंचित हो सकता है।
इसका नतीजा चाहे जो हो, लेकिन ये सच है कि बालिका वधू पर संसद में उठी निगाहों की प्रासंगिकता और जरूरत पर भी सवाल उठने लगे हैं। टेलीविजन की अतिरेकी भूमिका को लेकर शरद यादव की चिंताएं और उनके रूख से हर वह शख्स परिचित है, जो उनके थोड़ा-बहुत भी करीब रहा है। पूर्व गृह राज्य मंत्री गावित के खिलाफ चले स्टिंग ऑपरेशन को लेकर वे एक चैनल के खिलाफ वे कितने नाराज थे, इसे उन लोगों ने देखा है, जो राज्य सभा की कार्यवाही को कवर करते रहे हैं। लेकिन बालिका वधू पर उनका सवाल उठाना और उस पर ये आरोप लगाना कि यह बाल विवाह को बढ़ावा दे रहा है, समझ से परे लग रहा है। ये सच है कि टीआरपी के दबाव में खबरिया चैनलों ने जिस तरह खबरों से खिलवाड़ किया, उससे राजनेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग टेलीविजन से खार खाए बैठा है। मीडिया जगत में भी इस परिपाटी पर सवाल उठे...इस गलती को दबी जबान से ही सही, मीडिया के अंदरूनी हलके में भी स्वीकार किया जाने लगा है। लेकिन बालिका वधू पर सवाल और उसे लेकर सूचना और प्रसारण मंत्री के जवाब को लोग पचा नहीं पा रहे हैं।
ये सच है कि एक दौर में टेलीविजन का प्राइम टाइम सास-बहू के अंतहीन झगड़ों और उच्च वर्ग के परिवारों के बीच जारी षडयंत्र के किस्सों से गुंजायमान था। ऐसे माहौल में एक वर्ग को मनोरंजन चैनलों से भी ऊब होने लगी थी। ऐसे माहौल में जब पिछले साल बालिका वधू ने दस्तक दी तो दर्शकों ने इसे हाथोंहाथ लिया। एकरस कार्यक्रमों की भीड़ में बालिका वधू हवा के नए झोंके की तरह सामने आया। और देखते ही देखते इस सीरियल की नन्हीं बहू आनंदी यानी अविका गौर घर-घर की महिलाओं की चहेती बन गई। एक दौर तो ऐसा भी आया कि मनोरंजन चैनलों के प्राइम टाइम पर इसी धारावाहिक की तूती बोलने लगी और इसके साथ ही नए नवेले चैनल कलर्स ने अपना झंडा गाड़ दिया। फिर तो ना आना इस देश लाडो, अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजौ जैसे धारावाहिक आए और प्राइम टाइम में छा गए। सास-बहू की एकरस कहानियों से भरी प्राइम टाइम की दुनिया में इन धारावाहिकों की सफलता की वजह रहे इनके नए – नए और तकरीबन टेलीविजन की दुनिया से अछूते रहे विषय। प्राइम टाइम की दुनिया में भले ही इन धारावाहिकों की तूती बोल रही है, लेकिन राजनेताओं की निगाहें इन पर टेढ़ी होती जा रही हैं।
ये भी सच है कि बालिका वधू की कहानी में वह कसावट नहीं रही , जो शुरूआती कई हफ्तों में दिखती रही थी। टीआरपी के दबाव और कमाई के चलते इस धारावाहिक की कहानी में भी कई असहज और अप्रासंगिक मोड़ आने लगे हैं, जिनका कोई तर्क नहीं नजर आता। कुछ यही हालत अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजौ और ना आना इस देश लाडो की कहानी के साथ भी हो रहा है। लेकिन इसका ये भी मायने नहीं है कि ये धारावाहिक बाल विवाह, कन्या भ्रूण हत्या और बिहार में लड़की बेचने की कुप्रथाओं को बढ़ावा दे रहे हैं। सही बात तो ये धारावाहिक जिन चैनलों पर दिखाए जा रहे हैं, उन्हें सामान्य एंटीना के जरिए नहीं देखा जा सकता। इन्हें देखने के लिए केबल या डीटीएच की जरूरत होगी। और इस देश में विकास के तमाम दावों के बावजूद बड़े शहरों को छोड़ दें तो केबल या डीटीएच का खर्च वहन करने की क्षमता निम्न मध्यवर्ग और कम पढ़े-लिखे परिवारों के पास नहीं है। जाहिर है, उन घरों तक इन धारावाहिकों की पहुंच ही नहीं है। ऐसे में शरद यादव या भर्तृहरि महताब के इस आरोप को कैसे सही माना जा सकता है कि ये धारावाहिक शारदा एक्ट या फिर बाल विवाह कानून का उल्लंघन कर रहे हैं।
अगर कुरीतियों को दिखाना भी उसे बढ़ावा देना है तो भ्रष्टाचार को उजागर करना भी उसे महिमा मंडित करना हो जाएगा। और अगर एक बार हमने इसे मान लिया तो ये भी सच है कि भ्रष्टाचार का खुलासे पर भी संसद से लेकर सड़क पर सवाल उठने लगेंगे। जाहिर है ये मौका खुद मीडिया की अतिरेकी भूमिकाओं ने मुहैया कराया है। ऐसे में सबसे बड़ी जरूरत ये है कि राजनीति की ओर से हो रहे ऐसे सवालों का तार्किक जवाब दिया जाय। मीडिया और कला की मॉनिटरिंग होनी चाहिए। इसे खुले मन से मीडिया को भी स्वीकार करना चाहिए। लेकिन इसका ये भी मतलब नहीं है कि हर गैरजरूरी सवालों का भी सामना किया जाय। कम से कम मनोरंजन चैनलों के बदलाव भरे सीरियलों पर उठे सवाल तो ऐसी ही श्रेणी में आते हैं।

सोमवार, ८ जून २००९

ये सीरियल कुछ खास है!


उमेश चतुर्वेदी
हिंदी टेलीविजन की दुनिया में इन दिनों दो समानांतर धाराएं आगे बढ़ती नजर आ रही हैं। एक तरफ खबरिया चैनलों की दुनिया है, जहां पारंपरिक खबरों की सिमटती दुनिया का फिलहाल कोई तार्किक अंत होता नजर नहीं आ रहा है, जबकि दूसरी तरफ है मनोरंजन चैनलों की बदलती दुनिया। सास-बहू के अंतहीन झगड़े और महानगरों के बड़े और रईसजादे परिवारों के भीतर जारी साजिशों की दुनिया अब बदलती नजर आ रही है। कभी महिलाओं जीवन की करूणागाथा के प्रतीक रहे गीत अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजौ की पैरोडी अब सकारात्मक तौर पर बदल चुकी है। अब अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजौ से लेकर ना आना लाडो इस देश के बहाने अब महानगरीय जिंदगी की वे शामें बदलने लगीं हैं, जो टेलीविजन के पर्दे के सहारे आगे बढ़ती रही हैं।
हिंदी फिल्मी दुनिया के बारे में माना जाता है कि वहां जो मसाला एक बार हिट हो जाता है, उसकी तेजी से नकल शुरू हो जाती है। एक फिल्मी फार्मूले के दोहन की होड़ लग जाती है। सेटेलाइट चैनलों की बढ़ती भीड़ के शुरूआती दौर यानी करीब आठ साल पहले बॉलीवुड के इसी रोग ने हिंदी टेलीविजन चैनलों को भी घेर लिया था। सास-बहू के अंतहीन झगड़ों, प्यार-मोहब्बत की नाटकीय किस्सागोई और परिवार के भीतर रची जा रही साजिशों का इतना जोर बढ़ा कि बुद्धू बक्से की वह दुनिया ही पूरी तरह बदल गई, जिसकी बुनियाद हमलोग, बुनियाद, मैला आंचल, गणदेवता और शांति जैसे सीरियलों के जरिए रखी गई थी। निश्चित तौर पर ये दूरदर्शन का दौर था। दूरदर्शन के विस्तार के शुरूआती सालों में वही किस्सा दोहराया गया, जो कभी आजादी के ठीक बाद रेडियो के लिए तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री केसकर और आकाशवाणी के महानिदेशक जगदीश चंद्र माथुर ने मिलकर लिखा था। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि जिस दौर में यानी नब्बे के दशक में जब हिंदी टेलीविजन की सेटेलाइट दुनिया बदलने लगी थी, उसी दौर में उदारीकरण की शुरूआत हुई। और सास-बहू के साजिशों के किस्से रंगीन सेटेलाइट चैनलों के सहारे भारतीय मध्यवर्ग के ड्राइंग रूमों की शोभा बढ़ाने लगे। यह भी सच है कि जी टीवी ना सिर्फ हिंदी, बल्कि देश का पहला निजी सेटेलाइट चैनल रहा। अपने शुरूआती दिनों में उस पर वैसा बाजारवाद हावी नहीं रहा, जो आज से छह महीने पहले तक हर सेटेलाइट चैनल की पहचान बना हुआ था। हम पांच जैसे कुछ अर्थवान धारावाहिक उसकी जान रहे। उसे पहली बार टक्कर 1998 के आसपास मिलना शुरू हुआ, जब सोनी का टीवी चैलन लांच हुआ। इसके साथ ही शुरू हुए प्रतिस्पर्धा के दौर को तेजी मिली करीब आठ साल पहले, जब पीटर मुखर्जी की अगुआई में स्टार ग्रुप ने भारत में अपने पांव रखे। इसके साथ ही महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक के ड्राइंग रूम की तस्वीर बदलने लगी। निश्चित रूप से इसमें एकता कपूर के बनाए सीरियल क्योंकि सास भी कभी बहू थी या कहानी घर-घर की जैसे सीरियलों ने नई परिपाटी शुरू की। चूंकि तब तक बाजारवाद अपने चरम पर पहुंच चुका था, तब मुनाफा कमाना हर प्रोफेशन की पहली शर्त बन गया था। ऐसे में दूरदर्शनी जमाने शुरू हुई परंपरा को आघात लगना ही था। यही वह दौर है, जब शहरी मध्यवर्ग तेजी से उभर रहा था। इसका असर ये हुआ कि सास-बहू मार्का ये धारावाहिक और उनके साजिश रचने वाले पात्र ना सिर्फ लोकप्रिय हुए, बल्कि उनकी पहचान भी बनी। फिर तो ऐसे धारावाहिकों की जैसे बाढ़ ही आ गई। कसौटी जिंदगी की, कस्तूरी, कुमकुम एक प्यारा सा बंधन..जैसे तमाम सीरियल टेलीविजन के नए और तेजी से बढ़ रहे उपभोक्ताओं को तेजी से लुभाने लगे। टेलीविजन पर मनोरंजन का पूरा का पूरा संसार इसी फार्मूले पर चल पड़ा। जिसमें लोकप्रिय पात्र मरने के बाद जिंदा होते रहे। याद कीजिए क्योंकि सास भी कभी बहू थी के प्रमुख पात्र मिहिर को, इसे निभा रहे अमर उपाध्याय की मौत हुई, लेकिन कहानी की मांग के नाम पर उन्हें जिंदा किया गया। कसौटी जिंदगी की में भी ऐसा ही हुआ। स्टार प्लस अपने इन सीरियलों के जरिए आठ साल तक टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट में नंबर वन की कुर्सी पर बैठा रहा। जाहिर है इसमें सगुन, कहीं किसी रोज, विदाई, संजीवनी जैसे कई धारावाहिकों का योगदान रहा। पीटर मुखर्जी के स्टार ग्रुप से अलग होने के बाद ऐसी आशंका जताई जा रही थी कि उनके प्रोमोशन में शुरू हुए चैनल नाइन एक्स भी वैसा ही धमाका करेगा। लेकिन नहीं हुआ। अलबत्ता स्टार के दबाव में जी टीवी को भी सात फेरे, बेटियां जैसे सीरियल लाने पड़े। वहां भी वैसी ही साजिशें और अंदरूनी उठापटक जारी रही।
यही वह दौर रहा, जब हिंदी के खबरिया चैनलों पर पारंपरिक खबरों की बजाय सांप-बिच्छू नचाने, काल-कपाल और महाकाल दिखाने का दौर शुरू हुआ। ये कथानक और खबरें एक दौर तक तो अपने नयापन के चलते दर्शकों को लुभाती रहीं। लेकिन बाद में आलोचकों, समाजवैज्ञानिकों और प्रबुद्ध वर्ग द्वारा इसकी आलोचना होने लगी। लेकिन इस आलोचना से टेलीविजन चैनल अप्रभावित रहे। टीआरपी का दबाव और बहाना ऐसे सीरियलों को एलास्टिक की तरह बढ़ाते रहने का बहाना बना रहा। लेकिन पिछले साल आए टीवी 18 ग्रुप के नए चैनल कलर्स ने इन धारावाहिकों की दुनिया ही बदल दी। बाल विवाह के दंश पर आधारित सीरियल बालिका बधू आज टेलीविजन की रेटिंग प्वाइंट में नंबर वन बना हुआ है। इसकी वजह ये नहीं है कि इसमें पारंपरिक मसाले और लटके-झटके हैं। बल्कि इसमें बचपन में शादी के चलते परिवार, समाज और उस बच्चे की जिंदगी पर कैसा और क्या असर पड़ता है, इसे कथा में पिरोया गया है। कहना ना होगा, ऐसे अर्थवान धारावाहिक के जरिए हिंदी के मनोरंजन चैनलों की दुनिया फिर एक बार उसी ढर्रे पर लौटरने लगी है, जिसकी शुरूआत रमेश सिप्पी जैसे निर्माता और मनोहर श्याम जोशी जैसे लेखक के साथ दूरदर्शन ने नब्बे के दशक के शुरूआती दिनों में बुनियाद और हमलोग जैसे धारावाहिकों के जरिए की थी। कलर्स पर इन दिनों जितने भी सीरियल आ रहे हैं, उनमें कथ्य को लेकर ताजगी तो है ही, व्यापक सामाजिक सरोकारों से भी जुड़े हैं। कलर्स का ही एक और सीरियल है, ना आना इस देश मेरी लाडो। इसमें बालिका भ्रूण हत्या के मामले को कथा के फ्रेम में बेहतर तरीके से पिरोकर पेश किया गया है। जो देखने वाले का दिल छू लेता है। इसी तरह जीवन साथी में भी एक ऐसे परिवार की कहानी पेश की गई है, जहां परिवार का मुखिया अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए अपने परिवार और अपनी बेटी तक को दांव पर लगाने से नहीं चूकता। इसी तरह एक और अर्थवान सीरियल उतरन भी दिखाया जा रहा है, जिसमें एक बड़ा रईस परिवार अपनी एक गलती के चलते उसकी शिकार गरीब महिला और उसकी बेटी को ठाटबाट से पाल रहा है।
कलर्स के इन अर्थवान धारावाहिकों ने इस बाजार के अगुआ रहे स्टार प्लस, सोनी और जीटीवी को भी अर्थवान धारावाहिकों की दौड़ में शामिल होने के लिए मजबूर कर दिया। अब जीटीवी भी अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजौ जैसा धारावाहिक दिखाना पड़ रहा है। इसी तरह एक और धारावाहिक आपकि अंतरा जैसा धारावाहिक भी शुरू करना पड़ा है। वैसे जब क अक्षर वाले धारावाहिकों का दौर जारी था, उसी दौर में जस्सी जैसी कोई नहीं जैसा सीरियल सोनी पर दिखाया जाता रहा। उसका सीआईडी अभी तक चल ही रहा है। लेकिन नए दौर के चलन में उसे भी लेडीज स्पेशल लेकर आना पड़ा है। जिसमें चार महिलाओं की जिंदगी और आम जिंदगी में उनकी जद्दोजहद को पेश किया जा रहा है।
कलर्स के जरिए शुरू हुई धारावाहिकों की विविधरंगी दुनिया में दो चीजें खासतौर से नोट की जा सकती हैं। एक ये कि अधिकांश धारावाहिक महिला समस्याओं से दोचार होने के कथ्य से भरे पड़े हैं। दूसरा, अब तक बिहार और बिहारी लोग टेलीविजन धारावाहिकों में सिर्फ बदहाली और नौकर वाली भूमिकाओं के पर्याय रहे हैं। लेकिन अब वहां की भी वह जिंदगी लोगों के सामने आ रही है, जिसमें जिंदगी की परेशानियां भी हैं तो खूबसूरत रंग भी। उम्मीद की जानी चाहिए कि मनोरंजन चैनलों की दुनिया में आ रहे इस सकारात्मक बदलाव से खबरिया चैनल भी जल्द ही सबक लेंगे और खबरों की दुनिया भी उसी तरह बदलाव से भरी नजर आ सकेगी।

मंगलवार, २६ मई २००९

अखबारों के खिलाफ उठी आवाज


उमेश चतुर्वेदी
लोकसभा चुनावों के दौरान उम्मीदवारों से पैसे लेकर खबरें छापने और अखबारी पैकेज न लेने वाले उम्मीदवारों की चुनाव प्रचार तक की खबरों को जगह ना देने का विरोध वरिष्ठ पत्रकार तो कर रहे हैं, लेकिन चिंता की बात ये है कि खुद पत्रकारिता में इसे लेकर कोई अपराधबोध नजर नहीं आ रहा है। हिंदी के शीर्ष पत्रकार प्रभाष जोशी तो इस परिपाटी के खिलाफ मशाल लेकर निकल पड़े हैं। उन्होंने इसके खिलाफ अभियान छेड़ दिया है। प्रभाष जी मशाल लेकर निकलें और उसे भले ही अखबारों का साथ नहीं मिले, लेकिन जिस तरह से पत्रकारों का साथ मिलना शुरू हुआ है, उससे साफ है कि ये बात दूर तलक जाएगी।
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल के नोएडा परिसर की गोष्ठी लोकसभा चुनावों में मीडिया की भूमिका में प्रभाष जोशी ने कहा कि अखबारों और पाठकों के बीच विश्वास का रिश्ता होता है। अखबार में छपी चीजों पर पाठक भरोसा करता है। लेकिन उम्मीदवारों से पैसे लेकर खबरें छाप कर अखबार पाठकों के इसी भरोसे को तोड़ रहे हैं। प्रभाष जी जैसे वरिष्ठ पत्रकार ही ऐसा कह सकते हैं। क्योंकि ये भी सच है कि पत्रकारिता की दुनिया में इसे लेकर खास उहापोह नजर नहीं आ रहा है। इसका उदाहरण खुद उन्हें अपने ही शहर इंदौर में नजर आया। मई के दूसरे हफ्ते में वे इंदौर के अखबारों में शुरू हुई इस परिपाटी को लेकर तैयार रिपोर्ट को जारी किया तो उसकी एक कॉलम तक की खबर नहीं छपी। प्रभाष जी को इस बात का अफसोस है कि ये रिपोर्ट बी जी वर्गीज जैसे पत्रकारिता के शलाका पुरूष के हाथों हुआ, और इंदौर के अखबारों ने उनकी वरिष्ठता और पत्रकारिता में उनके योगदान तक का भी ध्यान नहीं रखा।
यह सिर्फ प्रभाष जी की ही पीड़ा नहीं है। पत्रकार और बीजेपी के राज्यसभा सांसद चंदन मित्रा ने तो इससे भी आगे की बात बताई। उनके मुताबिक चैनलों ने भी लोकसभा चुनावों के दौरान जमकर चांदी काटी है। उन्होंने खबरिया चैनलों का नाम तो नहीं लिया, लेकिन ये जरूर बताया कि खबरों के लिए आपस में मारकाट मचाने वाले कई चैनलों में राजनीतिक दलों से प्रचार का पैकेज हासिल करने के लिए जबर्दस्त एकता नजर आई। उन्होंने शर्त रखी थी कि ना सिर्फ उन्हें, बल्कि उनके बुके के दूसरे चैनलों को भी पैकेज देना होगा। दिलचस्प बात ये है कि पहले तो राजनीतिक दलों ने इसे नकार दिया, लेकिन बाद में उन्हें इसे मानना पड़ा। उनके अनुमान के मुताबिक अकेले चैनलों ने इस दौरान करीब 100 करोड़ का बिजनेस किया।
गोष्ठी में शामिल अधिकांश वरिष्ठ पत्रकारों का मानना था कि पैसे लेकर खबरें छापने का चलन अब शुरू हुआ है। लेकिन इसका प्रतिकार वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय और श्याम खोसला ने किया। रामबहादुर जी के मुताबिक 14 साल पहले महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में भी राजनीतिक दलों ने जमकर पैसे लिए थे। जबकि श्याम खोसला के मुताबिक पंजाब के विधानसभा चुनावों में भी ऐसा काफी पहले शुरू हो गया था। बहरहाल सबका यही मानना था कि इस परिपाटी से ना तो पाठकों को सही सूचनाएं पाने का अधिकार सुरक्षित रहेगा, ना ही यह लोकतंत्र के लिए बेहतर होगा। लेकिन आर्थिक पत्रकार आलोक पुराणिक का मानना कि जब मीडिया कंपनियां पूंजी बाजार और शेयर मार्केट से पूंजी जुटाएंगी तो उनका सबसे बड़ा उद्देश्य लाभ कमाना रह जाएगा। सही मायने में यही हो भी रहा है। लिहाजा उन पर भी अपने शेयरधारकों को फायदा पहुंचाने का दबाव बढ़ गया है और इस दबाव में उनके लिए ईमानदार पत्रकारिता से ज्यादा जरूरी पैसे कमाना रह गया है। इस गोष्ठी में राजनीति की ओर से सोमपाल शास्त्री ने अपनी पीड़ाएं जाहिर कीं। बागपत से पिछला लोकसभा चुनाव लड़ चुके सोमपाल शास्त्री ने कहा कि जिस तरह अखबारों ने उनसे खबरों के बदले पैकेज की मांग की, उससे उनका मन इतना खट्टा हुआ कि एक बारगी उन्होंने अखबारों के खिलाफ ही आवाज बुलंद करने की तैयारी कर ली थी।
बहरहाल इस परिपाटी का विरोध कैसे हो। इसका जवाब वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र प्रभु ने सुझाया कि अखबारी संस्थानों में ट्रेड यूनियनों को जब तक बढावा नहीं दिया जाएगा, पत्रकारों की नौकरियों की गारंटी नहीं होगी, तब तक वे इसके खिलाफ नहीं उठ खड़े होंगे। प्रभाष जी ने भी इसे स्वीकार तो किया, लेकिन उनका मानना था कि सिर्फ इतने से ही बात नहीं बनेगी। प्रभाष जी इस परिपाटी के खिलाफ जनजागरण पर तो निकल ही पड़े हैं। उनकी योजना चुनाव आयोग से ये मांग करने की है कि वह चुनाव प्रक्रिया के दौरान अखबारों में छपे विज्ञापनों का खर्च भी उनके चुनाव खर्च में जोड़े। इसके साथ ही वे वरिष्ठ पत्रकारों के साथ सुप्रीम कोर्ट में भी इसके खिलाफ याचिका दायर करने की तैयारी में हैं। इसके साथ ही उनका कहना है कि वकालत और डॉक्टरी जैसे प्रोफेशन की तरह पत्रकारों को शपथ पत्र पर हस्ताक्षर करना जरूरी किया जाना चाहिए। और गड़बड़ी करने पर उन्हें पत्रकार यूनियन निष्कासित भी करे। प्रभाष जी को इस बात का भी मलाल है कि इस गलत परिपाटी के खिलाफ एक भी पाठक खुलकर सामने नहीं आया। उन्होंने कहा कि अब पाठकों को जगाना होगा ताकि वे आदर्श पत्रकारिता के पक्ष में उठ कर खड़े हो सकें। उन्होंने कहा कि मीडिया की साख बचाने के लिए यह जरूरी है कि पैसे लेकर छापी जाने वाली खबरों को विज्ञापन का रूप दिया जाए। इसकी सूचना पाठकों को स्पष्ट रूप से देनी आवश्यक होनी चाहिए।
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति अच्युतानंद मिश्र पाठकों को जागरूक करने और उनके क्लब बनाने की वकालत करते रहे हैं। इस गोष्ठी में भी उन्होंने इस बात को आगे बढ़ाने पर जोर दिया। विश्वविद्यालय के नोएडा परिसर के निदेशक अशोक टंडन ने कहा कि इस अभियान का सिलसिला यहीं नहीं थमेगा।