Saturday, July 12, 2008

मराठी टीवी पत्रकार चाहिए ....

प्रतिष्ठित मराठी दैनिक सकाल के जल्द शुरू होने जा रहे मराठी टेलीविजन चैनल साम मराठी के लिए दिल्ली ब्यूरो में काम करने के लिए पुरूष और महिला रिपोर्टरों की जरूरत है। शर्त बस इतनी सी है कि उम्मीदवार मराठी अच्छी तरह लिख-बोल सकता हो। ग्रेजुएट हो और दिल्ली में महाराष्ट्र से जुड़ी राजनीति और संस्कृति की अच्छी समझ रखता हो। जो अपनी सेवाएं देना चाहते हैं, वे उमेश चतुर्वेदी से uchaturvedi@gmail.com पर संपर्क करें। शालीन व्यक्तित्व वाले 20 से 25 साल की उम्र वाले नौजवानों/ नवयुवतियों को प्राथमिकता दी जाएगी।

Monday, July 7, 2008

अदम्य जिजीविषा की कहानियां

उमेश चतुर्वेदी
ये समीक्षा अमर उजाला में छप चुकी है।
कैथरीन मैन्सफील्ड ने 35 वर्ष की छोटी-सी ही उम्र में जो भी रचा, उसने अंग्रेजी साहित्य में इतिहास रच दिया। कैथरीन की कहानियों के ¨हिंदी अनुवाद गार्डन पार्टी और अन्य कहानियां को पढ़ते हुए कैथरीन की सोच और ¨जिंदगी के प्रति अदम्य आशावाद को देखना बेहद दिलचस्प है। कैथरीन ने जब लेखन की शुरुआत की उस दौर में कहानी को शास्त्रीय ढंग से लिखना और शास्त्रीय ढांचे में कथानक, कथोपकथन और विषयवस्तु जैसे छह उपादानों में फिट किया जाता था, कैथरीन ने नई सोच के साथ इस फ्रेम को तोड़ा। कैथरीन की कहानियां गार्डन पार्टी हो या फिर दिवंगत कनüल की बेटियां या फिर आदर्श परिवार, हर जगह ना तो कथानक है और ना ही ढांचे में बंधा हुआ कोई अंत। कहानी का अंत एकदम से अचानक भी नहीं होता। क्लाइमेक्स पर अचानक से खत्म होती कहानियों के साथ पाठक भी बिंब और भाव के धरातल पर टंगा रह जाता है। लेकिन कैथरीन की इन कहानियों को पढ़ते हुए कहीं से भी ये बोध जागृत नहीं होता।


कैथरीन का जन्म उन्नीसवीं सदी के आखिरी दिनों में न्यूजीलैंड में हुआ था। न्यूजीलैंड आज भी कोई तेज भागती ¨जदगी वाला देश नहीं है, जैसा कि आज यूरोप, अमेरिका और काफी हद तक भारत और चीन की हालत हो गई है। पंद्रह साल की उम्र में लंदन पढ़ने गई कैथरीन ने फिर दोबारा न्यूजीलैंड का रुख नहीं किया। उसकी ज्यादातर ¨जिंदगी लंदन-पेरिस या जर्मनी में गुजरी। लेकिन न्यूजीलैंड की स्मृतियां कैथरीन की रचनाओं में शिद्दत से उभरती रहीं। गार्डन पार्टी, मिस ब्रेल और उसका पहला नाच पढ़ते हुए न्यूजीलैंड के उस दौर की सुस्त ¨जिंदगी के एक-एक रूप सामने आते हैं।


कैथरीन की जिंदगी का पहला प्यार संगीत था। वह प्रोफेशनल चेलीवादक बनना चाहती थी। लेकिन समय के थपेड़े और अपनी उद्विग्न ¨जिंदगी की बदौलत नहीं बन पाई। लेकिन अपने लेखन में उसने अपने इस पहले प्यार को ¨जिंदा रखा है। उसका पहला नाच और संगीत का सबक जैसी कहानियों में कैथरीन ने अपने इस पहले प्यार को बखूबी बरकरार रखा है। इन कहानियों को पढ़ने के बाद ही पता चलता है कि कैथरीन को संगीत की बारीकियां किस कदर पता थीं। बहरहाल कैथरीन की इन कहानियों के जरिए पहले विश्वयुद्ध के दौर के यूरोपीय समाज और बौçद्धक वातावरण को समझने में मदद मिलती है। उम्मीद है कि ¨हदी के पाठक भी विश्व क्लासिक की इस कृति के जरिए ना सिर्फ अंग्रेजी साहित्य की इस महान कृतिकार की रचनाओं से परिचित होंगे, बल्कि बीसवीं सदी के शुरुआती दौर के यूरोपीय समाज और एक विद्रोही महिला के स्वभाव से भी परिचित हो सकेंगे।

संपादक-कात्यायनी
पुस्तक - गार्डन पार्टी और अन्य कहानियां
कैथरीन मैन्सफील्ड
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य- - 75 रुपये।

Sunday, July 6, 2008

ये है पुरस्कारों की हकीकत !

पंजाबी साहित्यकार श्याम विमल की यह चिट्ठी जनसत्ता में प्रेमपाल शर्मा के एक लेख के प्रतिक्रियास्वरूप जनसत्ता में प्रकाशित हुई थी। इस चिट्ठी से जाहिर है कि हिंदी में पुरस्कारों की माया कितनी निराली है। लेकिन हकीकत तो ये है कि हिंदी के इस सियासी शतरंज से दूसरी भाषाओं के पुरस्कार अलग हैं। पेश है इसी चिट्ठी के संपादित अंश -
पंजाबी भाषी होकर भी मराठी में लिखी अपनी कविताओं की पांडुलिपि उन्हाचे तुकड़े पर वर्ष 1980-82 का प्रतिस्पर्द्धा पुरस्कार पूर्वकालिक शिक्षा-संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार से मुझे घर बैठे पुरस्कार मिला था। अपने हिंदी उपन्यास व्यामोह के स्वत:किए संस्कृत भाषांतर पर साहित्य अकादम का राष्ट्रीय अनुवाद पुरस्कार 1997 में बिना किसी पहुंच और सिफारिश आदि के बाद मिला। जबकि हिंदी में दस के ज्यादा पुस्तकों पर न दिल्ली में रहते हिंदी अकादमी से न उत्तर प्रदेश में रहते किसी हिंदी संस्थान से एक रूपए का भी पुरस्कार नसीब हुआ।...
दिल्ली की हिंदी अकादमी के सम्मान-पुरस्कार के वास्ते एक बहुपुरस्कृत कवि-मित्र ने मेरा नाम प्रस्तावित करने के लिए आत्म परिचय मांगा। भेज दिया, साथ में संस्कृत की एक सूक्ति भी जड़ दी- 'गंगातीरमपि त्यजंति मलिनं ते राजहंसा वयम्'यानी यदि तुम्हें लगे कि पुरस्कार की देयता में कुछ मलिनता या दाग की प्रतीति है तो कृपया नाम मत भेजना। इसी अकादमी में एक अन्य हितैषी मित्र ने किसी प्रोफेसर आलोचक को अपनी सद्य:प्रकाशित पुस्तक भिजवा देने का जोर डाला। भिजवा दी। मित्र ने उन सेवानिवृत्त प्रोफेसर से, जैसा कि मुझे फोन पर बताया गया, कहा होगा कि मेरी प्रेषित संसमरण पुस्तक पर अपने दो शव्द लिख दें तो उन धवलकेशी प्रोफेसर ने मेरे मित्र से कहा था- 'तुम्हीं पोस्टकार्ड पर मुझे लिखकर दे दो, मैं उस पर हस्ताक्षर कर दूंगा। 'उन वामपंथी के इस रवैये पर मुझे अपनी वर्ष 1980 में लिखी कविता की दो पंक्तियां याद हो आईं -'मेरा बायां हाथ सुन्न है / खून का दौरा नहीं हो रहा।'
एक प्रायोजित युवा पुस्तक-समीक्षक ने बिना पूर्वग्रह से मुक्त हुए मेरी उक्त पुस्तक में छपे हिंदी में बदनाम पुरस्कार प्रसंग पर मसीक्षांत अपना थोथा निचोड़ यह दे डाला -' सिद्धांत (पात्र) को दुख इस बात का है कि सोलह किताबें लिखने के बाद भी पुरस्कार क्यों नहीं मिलता। अपने हासिल पर पुस्तक के अंत में लेखक ने मन भर आंसू बहाए हैं।'आंसू की नाप-तौल निर्धारण के उन्के प्रतिमान के क्या कहने।

Saturday, June 28, 2008

साहित्‍य के लिए जगह नहीं !

भाई लालबहादुर ओझा ने अपने ब्लॉग पर हिंदी के मशहूर कथाकार पलाश विश्वास की पीड़ा को जगह दी है। उसे यहां हम भी साभार इसलिए साया कर रहे हैं ताकि मीडियामीमांसा के पाठकों को भी पता चले कि आमलोगों के लिए लिख रहे लोगों के प्रति अपना हिंदी समाज और क्रांतिकारी मेधा का कैसा व्यवहार है।
अपनी ही रचनाओं को नष्‍ट कर देना एक रचनाकार के लिए घोर निराशा का क्षण है। लेकिन उसे इस निर्णय तक ले जाने में कही न कहीं से हम सब भी जिम्‍मेवार हैं। पुरस्‍कारों और फेलोशिप के इस समय में प्रतिभाशील लोगों का छूट जाना, उपेक्षित हो जाना एक निर्मम घटना है। पलाश विश्‍वास का यह पत्र इसका जीवंत दस्‍तावेज है
रचना समग्र को तिलांजलि
पलाश विश्वास

पिछले पैंतीस साल से हिन्दी में लिखते रहने की उपलब्धियां अनेक है। झारखण्ड, उत्तराखण्ड और छत्तीसगढ़ के जनसंघर्षों में भागेदारी। उत्तरप्रदेश और बिहार मे मिला भरपूर अपनापा। मध्य प्रदेश और राजस्थान के पाठकों से संवाद बना रहा। पर जनपक्षधर लेखन के लिए अब कहीं कोई गुंजाइश नहीं बनती। सम्पादक प्रकाशक पूछता नहीं। आलोचक पढ़ते नहीं। तमाम लघुपत्रिकाएं पार्टीबद्ध या व्यवसायिक। व्यवसायिक मीडिया और साहित्य बाजार के कब्जे में। पूरा भारतीय उपमहादेश, यह खणड विखण्ड भूगोल इतिहास बालीवूड, कारपोरेट और क्रिकेट में निष्णात। धोनी और ईशान्त शर्मा की उपलब्धियों के सामने फीके पड़ने लगे हैं अमिताभ, किंग खान, सचिन तेंदुलकर, राहुल, गांगुली और अनिल कुंबले। शेयर सूचकांक और विकास दर में उछाल वाले शाइनिंग इण्डिया में एक अप्रतिष्ठत अपतिष्ठानिक मामूली लेखक की क्या बिसात। किराये के मकान में बसेरा। हिन्दी सेवा के पुरस्कार स्वरुप जीवन में कोई व्यवहारिक कामयाबी नहीं है। मकान मालिक की धमकियां अलग। कूड़ा जमा रखने से आखिर क्या हासिल होगा? पांडुलिपियों से कफन का इंतजाम तो नहीं होना है। सो, बारह तेरह साल की मेहनत की फसल अमेरिका से सावधान की प्रकाशित अप्रकाशित पांडुलिपियां, तमाम पूरी अधूरी कहानियां, उपन्यास, कविताएं, पत्र, पत्रिकाएं आज कबाड़ीवाले के हवाले करके बड़ी शान्ति मिली। अब कम से कम चैन से मर सकूंगा। अब हमें पांडुलिपियों के साथ फूंकने की नौबत नहीं आएगी।

जनम से बंगाली शरणार्थी परिवार से हूं। पिताजी स्वर्गीय पुलिन कुमार विश्वास आजीवन दलित शरणार्थियों के लिए देशभर में लड़ते खपते रहे। तराई में तेलंगना की तर्ज पर ढिमरी ब्लाक किसान विद्रोह के नेता थे। पुतिस ने पीटकर हाथ तोड़ दिया था। घर में तीन तीन बार कुर्की जब्ती हुई। कम्युनिस्ट थे। पर किसानों से कामरेडों के दगा और तेलंगना और ढिमरी ब्लाक के अनुभव से वामपंथ से उनका मोहभंग हो गया। पार्टी निषेधाज्ञा के विरुद्ध सन साठ में असम दंगों के दौरान वहां शरणाज्ञथियों के साथ खड़े होकर वामपंथ से हमेशा के लिए अलग होकर अराजनीतिक हो गये। पर सत्तर दशक के परिवर्तन के ख्वाबों के चलते, उस पीढ की विरासत ढो रहा हूं नन्दीग्राम और सिंगुर के बावजूद।

जनम से बंगाली। एणए किया अंग्रेजी साहित्य से और पढ़ाई का माध्यम अंग्रेजी। पर राजकीय इण्टर कालिज, नैनीताल के गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी ने परीक्षा की कापी जांचते हुए जो कहा कि हिन्दी भी तुम्हारी मातृभाशा है, उस आस्था से अलगाव नहीं हो पाया अबतक। चूंकि अब कुछ भी स्थानीय नहीं है उत्तर आधुनिक गैलेक्सी मनुस्मृति व्यवस्था में और स्वर्गीय पिता की विरासत भी कन्धे पर है, तो ग्लोवल नेटवर्किंग के मकसद से हाल में अंग्रेजी में लिखना शुरु किया है। पर लेखक तो रहा हूं हिन्दी का ही। इन पैंतीस वर्षों में शायद ही कोई पपत्र प्त्रिका बची हो, जिसम छपा नहीं हूं। यह सिलसिला १९७३ में दैनिक पर्वतीय नैलीताल से शुरु हुआ। रघुवीर सहाय जैसे ने दिनमान में जगह देकर हि्म्मत बढ़ाई।

छात्र जीवन में चिपको आंदोलन से जुड़ा रहा। नैनीताल समाचार और पहाड़ टीम का हिस्सा रहा हूं कभी। ताराचंद जी का सबक हम आज भी नहीं भूले कि जनपक्ष में खड़ा होना है तो संवाद का माध्यम हिंदी ही होना चाहिए। अपने घर में साल भर रखकर उन्होंने हमें वैचारिक मजबूती दी।

अंग्रेजी से एणए करने के बावजूद मैंने हिंदी प्तर्कारिता को आजीविका का माध्यम बनाया। मजा भी आया खूब। झारखण्ड में १९८० से १९८४ तक दैनिक आवाज में काम करते हुए आदिवासियों की जीवन यंत्रणा का पता चला। वहीं से एके राय और महाश्वेता देवी जैसी हस्तियों से अपनापा बना। खान दुर्घटनाओं पर अंधाधुंध का किया। जिसकी फसल मेरे कहानी संग्रह ईश्वर की गलती है। फिर मेरठ में सांप्रदायिक दंगों से आमना सामना हुआ। मेरा पहला कहानी संग्रह अंड सेंते लोग इसीका नतीजा है। लघठु उपन्यास उनका मिशन भी। टिहरी बांध पर लिखा लघु उपन्यास नई टिहरी पुरानी टिहरी।

फिर खाड़ी युद्ध का पहला अध्याय। तब मैं अमर उजाला के खाड़ी डेस्क पर था। इसके तुरन्त बाद सोवियत विघटन। अमेरिकी साम्राज्यवाद के भविष्य से नत्थी भारतीय उपहादेश ककी नियति का डर सताना शुरु किया तो लिखना शुरु किया अमेरिको से सावधान। बड़ी प्रतिक्रया हुई सन १९९९ तक। हजारों पत्र मिले। दैनिक आवाज में दो साल धारावाहिक छपा- जमशेदपुर और धनबाद में। बड़ी संख्या में लघु पत्रिकाओं ने अंश छापे। करीब बारह तेरह साल तक मैं इसी में जुटा रहा।

मनमोहन सिंह के वित्त मंत्री बनते ही भारत में नवउपनिवेशवाद चालू। फिर आये वाजपेयी। अब प्रणव मुखर्जी वास्तविक प्रधानमंत्री। मेरी दिलचस्पी न शरणार्थी आंदोलन में थी न दलित आंदोलन में। हमारी पूरी आस्था मार्क्सवाद, वर्ग संघर्ष और क्रांति में रही है। दुनियाभर का साहित्य और विचारधाराओं के अध्ययन के बावजूद मैंने कभी अंबेडकर को नहीं पढ़ा।

१९९० में कोलकाता आने पर यहां काबिज ब्राह्मवादी व्यवस्था से हर कदम पर टकराव होने लगा। फिर मैंने बंगाल और भारतीय उपमहादेश की जड़ों को टटोलना शुरू किया। अंबेडकर को भी पढ़ना शुरु किया। इसी बीच सन २००१ में पिता को िधन हो गया। उन्होंने अपना सबकुछ जनसेवा में न्यौछावर कर दिया। विरासत में हमें संपत्ति नहीं, संघर्ष और अपने लोगों के हक हकूक के लिए खड़ा हो जाने की प्रतिबद्धता मिली। माकपाइयों से संबंध मधुर रहे हैं। थी मामलात में पश्चम बंगाल का समर्थन भी मिलने लगा। फिर अचानक २००१ में उत्तरांचल पर काबिज भाजपा सरकार ने बंगाली दलित शरणार्थियों को यकायक विदेशी नागरिक करार दिया। वहां भारी आंदोलन हुआ तो पश्चम बंगाल से पूरा समर्थन भी मिला। किंतु २००३ में गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी ने नागरिकता संशोधन बिल पेश किया संसद में गुपचुप। द्वैत नागरिकता के बहाने पू्रवी बंगाल से आये और भारतभर में छितरा दिये गये विभाजन पीड़ितों को रातोंरात विदेशी नागरिक बना दिया गया। यह बिल संसदीय कमिटी के अध्यक्ष प्रणव मुखर्जी ने बिना किसी सुनवाई के मंजूर कर दिया। संसद में बहस नाममात्र हुई। तब मनमोहन सिंह विपक्ष में थे और उन्होंने विभाजन पीड़ित शरणार्थियों को नागरिकता देने की पुरजोर पेशकश की, जिसे प्रधानमंत्री बनते ही वे भुल गये। सबसे बड़ा हादसा यह था कि शरणार्थी, दलित, पिछड़ा आदिवासी और सर्वहारा की बात करने वोले वामपंथियों ने इस बिल को कानू बनाने में भजपाइयों को हर संभव सहयोग दिया।

रही सही कसर पश्चिम बंगाल में शहरी करण, औद्यौगीकरण और पूंजीवादी विकास अभियान ने पूरी कर दी। इस बीच कांग्रेस के केंद्रीय सत्ता में आते ही प्रणव मुखर्जी ने दलित बंगाली शरणार्थियों के खिलाफ देशबर में युद्धघोषणा कर दी। दरअसल नवउदारवाद के बहाने समूचे देश को आखेटगाह बना दिया गया। मूलनिवासियों का कत्लेआम होने लगा। और भारतीय उपमहादेश अंततछ अमेरिकी उपनिवेश बन गया। नंदीग्राम, सिंगुर, कलिंगनगर, विदर्भ, झारखंड, छत्तीसगढ़, पूर्वोत्तर भारत, कश्मीर, तमिलनाडु. आंध्र, गुजरात, नवी मुंबई और महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा और समूचे उत्तर भारत को श्मशान में तब्दील करने की साजिशें बेनकाब होने लगी। कल कारखाने , काम धंधे चौपट? न शिक्षा न रोजगार। शिक्षा, चिकित्सा का निजीकरण। मूल निवासी आजीविका और जीवन से बेदखल होने लगे।

अखारो और मीडिया में विदेशी पूंजी निवेश। क्रकेट कार्निवाल। बालीवूड की उछाल। मोबाइल, कंप्यूटर. टीवी के जरिए नीली क्रांति। साहित्य साफ्ट पोर्न में तब्दील। मनोगंजन ही कला का एकमात्र सरोकार। तमाम लेखक बुद्धिजीवी संगठन सत्तादलों के साथ। सत्तावर्ग का चेहरा बेनकाब। दिल्ली में सत्ता साहित्य और संस्कृति का केन्द्रीयकरण। जनपदों का सफाया। कृषि और कृषकों का सत्यानाश।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अब मानवाधिकार, लोकतंत्र और नागरिक अधिकार, संविधान, संप्रभुता और कानाल न्याय की तरह वायवीय अवधारणा मात्र। सर्वत्र बाजार संप्रभू।

सत्तापक्ष और विपक्ष एकाकार। जनांदोलन हैं ही नहीं। प्रतिरोध का क्रूरतापूर्वक दमन। मीडिया, मनी और माफिया का राज। ऐसे में साहित्य के लिए कहीं कोई स्पेस नहीं बचा।

यह कोई भवुक फैसला नहीं है। टाइम, स्पेस और मनी से हारे एक मामूली कलमकार के जीने का अंतिम राह है।

मेरे पाठकों , मुझे माफ करना।

Saturday, June 21, 2008

भोजपुरी हमार, बोली बाजार

उमेश चतुर्वेदी
दिल्ली, मुंबई से लेकर कोलाकाता तक उपहास और उपेक्षा का पात्र रहा भोजपुरी समाज अचानक क्षमतावाला बाजार हो गया है. इस संभावित और अनछुए बाजार में इतनी ताकत नजर आ रही है कि मीडिया की दुनिया में उतर रहे बड़े खिलाड़ी बाकायदा खबरिया चैनल लाने की तैयारी में जुट गए हैं। जबकि मीडिया और इंटरटेनमेंट की दुनिया के नामीगिरामी हस्तियां मनोरंजन चैनल लेकर बाजार में उतरने की तैयारी में हैं।

करीब दो दशक पहले पत्रकारों की जिदगी को केंद्र में रखकर नईदिल्ली टाइम्स नाम की फिल्म बना चुके पी के तिवारी के दिमाग की उपज है महुआ चैनल। महुआ चैनल के समाचार प्रमुख अंशुमान त्रिपाठी के मुताबिक इस चैनल में जहॉ भोजपुरी में खबरें होंगी, वहीं दमदार प्रोग्रामिग भी जोर रहेगा। इसके लिए अंशुमान त्रिपाठी की टीम शिद्दत से जुटी हुई है। वहीं हमार टीवी के भी आन एयर होने की तैयारी शुरू हो चुकी है। इस चैनल को पूर्व मंत्री मतंग सिंह की कंपनी लाने जा रही है। मतंग सिंह नरसिंह राव सरकार में मत्री रह चुके हैं। असम से राज्यसभा के लिए चुने जाते रहे मतंग सिंह की मूलत- बिहार के रहने वाले हैं. शायद यही वजह है कि उनकी दिलचस्पी भदेसपन की भाषा में खबरिया चैनल लाने की है। इस चैनल के प्रमुख हैं कुमार संजाìय सिंह। कभी कुमार सजय सिंह के नाम से जाने जाते रहे संजाìय का टेलीविजन और प्रिंट पत्रकारिता में अच्छा खासा अनुभव है। फिलहाल ये चैनल तैयारियों में जुटा हुआ है। इसके अलावा पुरूवा नाम का एक चैनल भी भोजपुरी खबरों की दुनिया में दस्तक देने की तैयारियों में जुटा हुआ है। इसी तरह एक ग्रुप गंगा नाम से भी चैनल लाने की तैयारी में जुटा हुआ है।

आखिर क्या वजह है कि भदेसपन की इस भाषा को लेकर मीडिया दिग्गज़ों और नए खिलाड़ियों को अपने मीडिया साम्राज्य के लिए काफी संभावनाएं नजर आ रही हैं। दरअसल पिछले दो साल में भोजपुरी फिल्मों ने जिस तरह सफलता के नए मानदंड स्थापित किए हैं उससे एक वर्ग को लगता है कि मीडिया और इंटरटेनमेंट की दुनिया के लिए भोजपुरी का बड़े बाजार के तौर पर उभरना अभी बाकी है। इन मीडिया हाउसों को लगता है कि अगर उन्होंने शुरूआती बाजी मार ली और बाजार पर अपनी पकड़ बना ली तो सफल होना आसान होगा। वैसे भी काफी कम बजट में बनी भोजपुरी फिल्में करोड़ों का बिजनेस कर लेती हैं।

दो साल पहले बनी भोजपुरी फिल्म ससुरा बड़ा पैसे वाला ने सफलता के वे झंडे गाड़े कि भोजपुरी में लोगों को बड़ा बाजार नजर आने लगा। ये फिल्म महज 27 लाख रूपए में बनी थी और उसने छह करोड़ का बिजनेस किया। इसके बाद तो मनोज तिवारी की फिल्म दरोगा बाबू आई लव यू समेत कई फिल्मों की बाढ़ आ गई। अवधीभाषी रवि किशन भी भोजपुरी सिनेमा के सुपर स्टार हो गए। भोजपुरी का जलवा ही कहेंगे कि अमिताभ बच्चन और मिथुन चक्रवर्ती भी सिल्वर स्क्रीन पर भोजपुरी बोलते नजर आने लगे। नगमा को भी भोजपुरी बोलने से परहेज नहीं रहा। ऐसे में मीडिया और इंटरटेनमेंट के दिग्गज भला क्यों पीछे रहते। सूचना और प्रसारण मत्रालय से छन कर आ रही खबरों पर भरोसा करें तो मीडिया की दुनिया में अपनी सफलताओं का परचम लहरा चुके जी टेलीफिल्म और श्री अधिकारी ब्रदर्स भी भोजपुरी में इंटरटेनमेंट चैनल लाने की तैयारी में जुट गए हैं। पूर्व सूचना और प्रसारण सचिव रतिकॉत बसु की कंपनी भी भोजपुरी में नया चैनल लाने की तैयारी में है। खबरिया चैनल की दुनिया में हाल ही में कदम रख चुकी हरियाणा के पूर्व मंत्री विनोद शर्मा की कंपनी इंडिया न्यूज भी भोजपुरी में न्यूज चैनल लाने की तैयारी में जुटी है।

वैसे हिंदी में राष्ट्रीय कहे जाने वाले कम से दस चैनल हो गए हैं। कुछ एक अभी भी आने की तैयारी में हैं। लेकिन ये भी सच है कि हिंदी की राष्ट्रीय टेलीविजन पत्रकारिता में इससे ज्यादा स्पेस की गुंजाइ?श फिलहाल नहीं दिखती। लिहाजा इन दिनों क्षेत्रीय चैनलों की भी जोरदार तैयारियॉ चल रही हैं। वैसे इसकी शुरुआत इनाडु टीवी ने उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड, बिहार-झारखंड, मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ और राजस्थान के लिए अलग से चार क्षेत्रीय चैनल लाकर क्षेत्रीय टीवी पत्रकारिया की हिंदी में शुरूआत की थी। गुजराती, बॉग्ला, मराठी, तेलुगू, तमिल और कन्नड़ की टीवी पत्रकारिया में इनाडु ने ही पहले-पहल कदम बढ़ाया। अब तो जी और स्टार के भी गुजराती, मराठी, बॉग्ला और तेलुगू में अपने स्वतंत्र चैनल हैं।

अब इन क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों के अपने स्वतंत्र चैनल हो सकते हैं तो सवाल ये है कि 19 करोड़ लोगों की भाषा भोजपुरी में अपना कोई चैनल नहीं हो सकता है। टीआरपी की दुनिया में सबसे बड़ा बाजार मुंबई है। आज हालत ये है कि मुंबई में भी पूरबिये लोगों की संख्या करीब चालीस लाख हो है। टीआरपी के लिहाज से दूसरे बड़े बाजार दिल्ली में भी करीब चालीस लाख भोजपुरीभा?षी और पूरबिए हैं। कोलकाता की 56 फीसदी जनसंख्या गैर बॉग्लाभाषी है। जिसमें सबसे ज्यादा लोग पूवी उत्तर प्रदेश और बिहार के भी लोग हैं। मध्यवर्गीय बाजार में इनकी भी हैसियत कोई कम नहीं है। इसके साथ ही मारीशस, फिजी, गुयाना जैसे देशों में भी भोजपुरी भाषियों की संख्या लाखों में हैं। जाहिर है- इस भाषा में भी एक बड़ा बाजार इंतजार कर रहा है। और मीडिया के नए-पुराने खिलाड़ियों की इसी बाजार पर निगाह है।

लेकिन सबसे बड़ी आशंका इन चैनलों के कंटेंट को लेकर है। साठ के दशक में भोजपुरी में बनी पहली फिल्म गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो में एक सामाजिक संदेश भी था। लागी नाहीं छूटे राम से लेकर दूल्हा गंगा पार के और रूठ गइले संइया हमार जैसी फिल्मों में ये परंपरा जारी रही। लेकिन हाल के दिनों में बनी भोजपुरी फिल्में कंटेंट और कथ्य के स्तर पर कुछ खास छाप नहीं छोड़ पाई हैं। यही हाल इस इलाके के लिए रिकार्ड किए जा रहे म्यूजिक की भी है। सबसे बड़ा खतरा ये है कि खबरों में भले ही ये प्रवृत्ति ना दिखे, भोजपुरी चैनलों की प्रोग्रामिग पर इसका असर दिख सकता है। ऐसे में ये चैनल कहीं हंसी का पात्र ना बन जाएं, इसका खास खयाल रखा जाना होगा जरूरी होगा, तभी खबरिया चैनलों की दुनिया में भदेसपन की भाषा के ये चैनल भोजपुरी लोगों के विकास के साथ ही उनकी सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं को मुखर आवाज देने में सफल होंगे।

Saturday, June 14, 2008

जाति न पूछो साधु की ...

उमेश चतुर्वेदी
हिंदी ब्लॉग जगत में इन दिनों मीडिया में पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक लोगों की कमी को लेकर कुछ लोग हलकान हुए जा रहे हैं। उन्हें लगता है कि अगर मीडिया में पिछड़े, अल्पसंख्यक और दलितों की भागीदारी ज्यादा होती तो शैक्षिक संस्थानों में आरक्षण और ऐसे ही दूसरे मसलों पर मीडिया की भूमिका कुछ और ही होती। नरेंद्र मोदी समेत हिंदू( फासिस्टों ) संगठनों को लेकर मीडिया की सोच कुछ और ही होती। दलितों के अधिकारों को जोर-शोर से उठाया जाता। इन लोगों को लगता है कि लालू यादव और मायावती जैसे पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक तबके के नेताओं के प्रति भी सवर्ण मीडिया का रूख कुछ दूसरा ही होता। यानी इस चर्चा का प्रमुख लब्बोलुबाब ये है कि मीडिया की आज की अतिवादिता के लिए यह सवर्णवाद ही जिम्मेदार है।
यहां एक बात बता देना मैं जरूरी समझता हूं। आमतौर पर समाजवादियों और वामपंथियों में तमाम मुद्दों पर वैचारिक मतभेद रहते हैं। लेकिन इस सवर्णवाद की चर्चा दोनों तबके ने मिलकर शुरू की। इसे लेकर सबसे पहला सर्वेक्षण मेरे क्लासफेलो वामपंथी एक्टिविस्ट जितेंद्र कुमार, वरिष्ठ वामपंथी पत्रकार अनिल चमड़िया और समाजवादी विचारक और चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव ने किया। इस सर्वेक्षण का उद्देश्य समानता का दावा करने वाले पत्रकारिता और मीडिया संस्थानों का आइना दिखाना था। लेकिन ब्लॉग पर जिस तरह ये चर्चा मीडिया की अतिवादिता का इसे कारक बनाने को लेकर होती जा रही है - शायद इस सर्वेक्षण का ये उद्देश्य भी नहीं था।
यह सच है कि मीडिया की भर्तियों में अपनी तरह का एक खास वर्गवाद जोरों पर है। लेकिन मैं कम से कम इससे असहमत हूं कि इसमें सवर्णवाद का बोलबाला है। नाम से ही जाहिर है कि मैं ब्राह्मण परिवार से आता हूं। लेकिन इसका मुझे तो कोई फायदा कम से कम इस नाम पर नहीं मिला। जबकि मैं कई बड़े ब्राह्मण पत्रकारों के यहां नौकरी पाने का दरबार लगाता रहा हूं। लेकिन उन्होंने उन लोगों को पसंद किया -जो किसी और विरादरी के थे। मैं नाम नहीं गिनाना चाहता, वक्त आएगा तो इससे भी परहेज नहीं रहेगा। अखबारों में छपने के लिए ब्राह्मणवाद ने भी मेरी मदद नहीं की। जबकि कई अखबारों में छापने की स्थिति में कई ब्राह्मण नामधारी पत्रकार रहे। अपने बीच के संघर्ष के दिनों में ब्राह्मण पत्रकारों ने तो मुझे जमकर टरकाया।
जहां तक मैंने देखा है कि मीडिया संस्थानों में नौकरी सिर्फ ब्राह्मण या दलित के नाम पर नहीं मिलती है। वहां नौकरी पाने के लिए विचारधारा और चंपूगिरी अहम भूमिका निभाती है। अगर नौकरी देने की स्थिति में दक्षिणपंथी पत्रकार होते हैं तो उन्हें अपनी ही विचारधारा के पत्रकार पसंद आते हैं। अगर भर्तियां करने की हालत में वामपंथी विचारक रहे तो उन्हें आईसा और एसएफआई से जुड़े संघर्षशील ही पसंद आते हैं - भले ही उन्हें एक लाइन ठीक से लिखना न आता हो और ना ही उन्हें समाचार की समझ हो। इसे आप क्या कहेंगे। ऐसी सूचनाएं आपको हर चैनल और हर अखबार में मिल जाएंगी। ऐसे में मारा जाता है - बेचारा वह संघर्षशील, जो अपने छात्र जीवन में ना तो एबीवीपी या आईसा से जुड़ा नहीं रहा। उसे नौकरी मिल भी गई और ग्रुप में शामिल नहीं हुआ तो उसके इक्रीमेंट और प्रोमोशन का भगवान ही मालिक है।
रही बात मीडिया के कंटेंट सुधरने की - तो मित्रों आपके आसपास कई ऐसे रसूखदार लोग होंगे- जो सुधार और उदारीकरण का जमकर विरोध करते रहे हैं। लेकिन अपने अखबार या टीवी चैनल में प्रबंधन की इच्छा के नाम पर भूत नचाते रहते हैं, सेक्स की छौंक दर्शकों को परोसते रहते हैं। जब चैनल चलाने या अखबार निकालने की बारी आती है तो उनकी सारी क्रांतिधर्मिता धरी की धरी रह जाती है। वैसे इसका भी कोई ठोस सबूत नहीं है कि प्रबंधन ने उन्हें ऐसा करने के लिए कहा ही हो - लेकिन प्रबंधन के नाम पर ऐसा करने में उन्हें अपनी क्रांतिधर्मिता में कोई कमी नजर नहीं आती। दक्षिणपंथी पर तो आरोप लगते ही हैं, वह बेचारा बना ही ऐसा है। लेकिन क्रांति करने वाले लोग क्यों झुक जाते हैं, ये अब तक मेरी समझ में नहीं आया। आपको नजर नहीं आ रहा हो मित्रों इस नजरिए से अब मीडिया संस्थानों की ओर देखिए। आपको इस बहस का औचित्य समझ में आ जाएगा।

Tuesday, June 10, 2008

आखिरकार मुंशी जी को मिली फुर्सत

आखिरकार भारतीय जनसंचार संस्थान के पत्रकारिता के छात्रों को डिप्लोमा देने के लिए सूचना और प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दास मुंशी ने वक्त निकाल ही लिया। दीक्षांत समारोह 12 जून को किया जा रहा है। जिसमें मुख्य अतिथि के तौर पर विदेशमंत्री प्रणव मुखर्जी भी हिस्सा ले रहे हैं। बंगाल के दो-दो महाशय इस बार दीक्षांत समारोह की शोभा बढ़ाएंगे। छात्रों के डिप्लोमा की मियाद पिछले 30 अप्रैल को ही खत्म हो गई है। लेकिन मुंशी जी की डायरी में पत्रकारिता के छात्रों की औकात कुछ खास नहीं थी। लिहाजा वे वक्त ही नहीं निकाल पा रहे थे। रही बात संस्थान की अफसरशाही की - तो उसकी औकात कहां बिना अपने मंत्री के इशारे के कोई कदम उठाए। वैसे दावा तो किया जाता है कि ये संस्थान स्वायत्त है। लेकिन मंत्री की मर्जी के बगैर यहां शायद ही कभी पत्ता हिलता हो। वैसे वामपंथी दल अक्सर भारतीय इतिहास अनुसंधान संस्थान और एनसीईआरटी की स्वायत्तता की रक्षा के लिए संसद से लेकर बाहर तक तलवार निकालते रहते हैं। लेकिन इस संस्थान की स्वायत्तता को बनाए रखने की ओर उनका ध्यान नहीं जाता।
वैसे भी पहले ये कार्यक्रम सुबह साढ़े दस बजे होना प्रस्तावित था। लेकिन मंत्री जी को कुछ नया काम निकल आया - लिहाजा अब ये कार्यक्रम सुबह नौ बजे ही होगा। संस्थान के इतिहास में ये पहला मौका है - जब इतनी देर से दीक्षांत समारोह आयोजित किया जा रहा है।